श्रेष्ठ बनाने के लिए ईश्वर का चिंतन और मनन आवश्यक है

जैसे ही अन्तरूकरण में ब्रह्म जिज्ञासा की तीव्रता जागृत होती है मन-बुद्धि सहज होने लगते हैं एवं संपूर्ण सृष्टि में माधुर्य-सौंदर्य, एकत्व और परिपूर्णता जैसे दिव्य अनुभव स्थिर होने लगते हैं ! ईश्वर का विचार शान्ति, आनन्द एवं सरसता प्रदाता है ..!  ईश्वर को जानना, उसके स्वरूप व गुणों का चिन्तन मनन तथा ध्यान तथा सदाचरण ही उपासना है। गुरु कृपा या ईश्वर की कृपा से हम जीवन में और आध्यात्मिक पथ पर प्रगति कर सकते हैं। ब्रह्म जिज्ञासा गुरुकृपा या ईश्वर की कृपा से अति शीघ्र जागृत होती है। जब तक ईश्वर का अनुग्रह नही होता, तब तक सदगुरू और सत्शास्त्र नहीं मिलते। जगत का बोध करा दें संसार मे ऐसे कई लोग मिलेंगे, लेकिन जगदीश्वर तत्त्व का बोध करा दें, ऐसे सदगुरू की प्राप्ति दुर्लभ है। लोक-लोकान्तर, स्वर्ग या वैकुण्ठ की प्राप्ति नहीं, लेकिन अपने आपका बोध करा दें ऐसे आत्मवेत्ता सदगुरू की प्राप्ति दुर्लभ है। जो स्वयं ब्रह्मानन्दस्वरूप हैं, परम सुख देने वाले हैं, ज्ञान की मूर्ति हैं, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से रहित हैं, आकाश के समान निर्लेप है। महा वाक्यों से जाने जा सकें ऐसे गूढ़ हैं, नित्य हैं, विमल हैं, अचल हैं, निरन्तर साक्षीरूप हैं, कल्पना में न आवें ऐसे हैं, तीनों गुणों से परे हैं, वे ही सदगुरू हैं। ऐसे गुरू भाग्यवश ही प्राप्त होते हैं। सत्स्वरूप सद्गुरु का संग हो जाये, सत्य का बोध हो जाय ऐसा सत्संग मिलना दुर्लभ है। जब तक ब्रह्मविचार नही होगा, तब तक भगवत्तत्व का साक्षात्कार नहीं होगा। आत्मा-अनात्मा का विचार करके ब्रह्मस्वरूप को जानना, श्रवण, मनन और निदिध्यासन में मग्न रहना, यह ब्रह्मविचार है। जिस प्रकार भोजन में स्वाद नहीं होता, स्वाद भूख में होता है, उसी प्रकार भक्ति भावना में लीन भक्त को ईश्वर से मिलने की तड़प होती है। अतः जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए ईश्वर का चिंतन और मनन आवश्यक है। मानव जीवन जन्म-जन्मांतर के पुण्य कर्मो से प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को इसे श्रेष्ठ बनाना चाहिए ...।


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