हमारा भाग्य पुराने कर्माें पर आधारित होते हैं

हमारा यह जन्म पृथ्वी लोक पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण समय में हुआ है, जब ईश्वर स्वयं ही सारे हृदय में अवतरित होकर हनुमान जी के रूप में हम सबका कल्याण करने आ गये है। इसके लिये उन्होंने हमें अपने जीवन के उद्धार के लिए ''हनुमान उपाय'' वरदान के रूप में दिया है। इसी 'हनुमान उपाय' के अन्तर्गत उन्होंने हमें प्रसाद रूप में चींटी दाना डालने का एक बहुत ही सहज और सरल तरीका भी बताया है। चींटियों को दाना डालना हनुमान उपाय का अत्यन्त प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण अंग है। यह है तो एक सहज छोटी-सी प्रक्रिया परन्तु इससे होने वाला लाभ बड़ा ही अनमोल है। हनुमान जी ने साक्षात रूप में यह दिखाया है कि सारी सृष्टि के कल्याण की प्रार्थना करते हुये चींटियों को दाना डालने से बहुत ही पवित्र ईश्वरमयी तरंगें निकलती हैं। ये पवित्र एवं अलौकिक तरंगें बड़ी ही तीव्र गति से ब्राह्माण्ड में पहुँच जाती हैं। इन तरंगों में एक बहुत ही अद्भुत शक्ति होती है। जो हमारे पुराने पाप कर्माें के पहाड़ आसानी से और तीव्र गति से चूर-चूर कर देती है तथा नये कर्मों को बनने नहीं देती है। इस प्रक्रिया के महत्व को आप इस तरह से समझ सकते हैं कि हमारे जीवन में तीन प्रकार के कर्मों की धाराएँ निरन्तर बहती रहती हैं। हमारे अच्छे-बुरे कर्मों की तीन धाराओं के नाम हैं- संचित, प्रारब्ध और वर्तमान। संचित कर्मधारा पिछले सारे जन्मों के कर्मों का संग्रह है। जिन कर्माें का फल हम अपने इस वर्तमान जन्म में लेकर आये हैं वह है प्रारब्ध कर्मधारा! वर्तमान कर्मधारा वह है जो नये कर्म हम इस जीवन में कर रहे हैं! यह तीनों धाराएँ जीवन्त एवं अत्यन्त सक्रिय हैं तथा हमारे जीवन को हर क्षण प्रभावित करती रहती हैं। हमारा भाग्य भी पूरी तरह से निश्चित नहीं और न ही पत्थर पर खींची लकीर की तरह स्थायी एवं ठोस है। हमारा भाग्य तरल नदी की धारा की तरह है जो सदैव परिवर्तनशील है। हमारा भाग्य पुराने कर्माें पर आधारित होते हुए भी स्वछन्द और स्वतन्त्र है और बहती नदी की तरह हर पल नये रूप में ढलता हुआ सदैव नये-नये आयामों की तरह अग्रसर होता रहता है। इस बहाव पर हमारे तीनों प्रकार के कर्मों का एक विशेष प्रभाव पड़ता हैं।