जनमानस की दृष्टि मे शनि


शनि अति घीमी गति से चलने वाला ग्रह है, जो राशि चक्र को करीब 30 वर्ष और एक राशि को ढाई वर्ष या 30 माह मे तथा एक माह मे एक अंश चलता है। शनि जहाँ एक और दीर्घायु प्रदान करता है वही दुःख रोग व दुर्भाग्य देता है। शनि को पापी और क्रूर ग्रह कहा गया है, जो तामसिक और महान दुःखदायक ग्रह है। शनि जातक के अहंकार का विनाश करता है। विनम्र प्रकृति के लोंगों पर शनि का दुष्प्रभाव कम होता है। अंहकार विनाश का शनि जातक को गहन विचार करके समस्या के सही कारण को तलाश कर उसका समाधान कराता है। शनि आकृति मे खिड़की के समान, तीक्ष्ण, ठंडा, स्त्री, नपुंसक, मलेच्छ जाति, काला वर्ण, वायु तत्व, तमो गुणी, लंबाई मे छोटा, बूढा, झुर्रियों वाला, नसें देखने वाला, आलसी, तिरछी नजर, अधोदृष्टि वाला ग्रह है। इसमे गतिशीलता, स्थिरता दोनो गुण है। यह 36 व 47 वर्श की  अवस्था मे अपना विशेष फल देता है।
प्रभाव:-
संघर्ष का कारक होने के कारण शनि व्यक्ति को जीवन मे आने वाले कष्टों और संकटों से झूझने तथा जीवन की समस्याओं को हल करके जीवन मे उन्नति करने का अवसर देता है। शनि जिस भाव मे बैठता है। उस भाव की वृद्धि करके उस भाव के उत्तम फल देता है। परन्तु जिस जिस भाव पर उसकी पूर्ण दृष्टि पड़ती है। वहां के तत्वों का भारी विनाश, संकट तथा दुर्भाग्य, उस भाव की वस्तुओं से संबधित अनेक समस्याओं या उस भाव मे फलो को अति विलंब से या कभी-कभी पूर्णतः वंचित भी कर देता है। यह व्यक्ति को नीचे गिराता है। कुसंगति और अपमान देता है। कभी-कभी नशेड़ी बना कर जीवन बरबाद कर देता है। अत्यंत मंद गति के कारण जीवन में प्रगति रूक जाती है। यह व्यक्ति के जीवन मे घृणा, शत्रुता, ईष्र्या, निराशा, नीरसता के बीज बोता है। त्रिषड़ाय भावों मे (3, 6, 11 भाव मे) सदैव शुभफल प्रदान करता है। शनि का घुटनों, दांतों, स्नायुमंडल तथा अस्थियों पर गहरा असर पड़ता है। जिससे रोग होता है। शरीर कमजोर होता है। शनि प्रधान व्यक्ति उत्तम धर्मोदेशक, शिक्षक, भवन निर्माता, कृषि, मैकेनिक होते है।
शनि के द्वादश भाव फल:-
1. प्रथम भाव मे षनि कुरूप, क्रोधी कामुक, दरिद्री, रोगी, व्यभिचारी होता है। मकर तुला का लग्नस्थ शनि धनी बनाता है। अंत मे गंभीर बनाता है।
2. द्वितीय भाव का षनि दंत रोगी, मुख रोगी, आलसी, धनहीन व द्ररिद्री बनाता है। सम्मान की हानि करता है। यदि कुंभ या तुला का हो तो लाभदायक होता है।
3. तृतीय भाव मे शनि भाई बहनों के लिये हानिकारक होता है। किन्तु जातक को बुद्धिमान, विद्वान, भाग्यवान, दानी नेता व शत्रुहंता बनाता है। 
4. चतुर्थस्थ भाव का शनि जातक को बलहीन, अपमानित और अशिक्षित बनाता है। व्यक्ति को व्यर्थ भगाता है। माता, भूमि, भवन से दूर करता हैा माता की मृत्यु भी हो सकती है।
5. पंचम भाव का शनि जातक को बुद्धिहीन, क्रूर, सेक्सी, बनाता है। शारीरिक व मानसिक रूप से निर्बल बनाता है। टेकनिकल शिक्षा देता है। और वैवाहिक जीवन मे अलगाव देता है।
6. छठे भाव का शनि चरित्रवान धनवान, सुखी, प्रतिष्ठित, षत्रु विनाशक, परन्तु रोगी बनाता है।
7. 7 वें भाव का शनि व्यक्ति को क्रूर, कपटी, दुर्जन, विलासी, आलसी, कामुक बनाता है। वैवाहिक जीवन नष्ट करता है।
8. 8 वें भाव का शनि मोटापा, दीर्घकालीन रोग, दमा, टी. बी., मधुमेह, खांसी देता है। जातक डरपोक, झूठा, धोखेबाज होता है। 
9. नवम भाव का शनि दुबला-पतला वात रोगी, आलसी, निर्धन डरपोक, मातृहीन बनाता है। आलसी, निर्धन डरपोक, मातृहीन बनाता है। जातक तंत्र-मंत्र के चक्क्र तक रहता है। और च्यर्थ इधर-उधर घूमता है।
10. दशम भाव का शनि भाग्यषाली, धनवान, उच्च अधिकारी, यशस्वी, प्रतिष्ठा देता है। मठाधीश या सन्यासी बनाता है।
11. एकादष भाव का शनि दीर्घायु परिश्रमी, पुत्रवान, विद्वान, धनवान व सुखी बनाता है। किन्तु अषिक्षित तथा वाहनहीन करता है।
12. द्वादष भाव का शनि दुःखी आलसी अपव्ययी, नशेड़ी व रोगी करता है। बचत नष्ट हो जाती है। मामा को कष्ट मिलता है। बुढापे मे भारी कष्ट मिलते है।
द्वादष भावस्थ शनि के फल:-
1. मेष का शनि नीच का होता है। दुःखी आलसी अपव्ययी, नशेड़ी व रोगी बनाता है। दुराचारी, जिद्दी, झगड़ालु, मक्कार तथा जातक तंत्र मंत्र के चक्कर तक रहता है। व्यवसाय मे घाटा व भारी उतार चढाव होता है।
2. वृष का शनि धनी, कभी कभी निर्धन, दुःखी, एकाकी जीवन जीने वाला, भोगी विलासी, सौन्दर्य पूर्ण वस्तुओं को कारोबार करने वाला होता है।
3. मिथुन का शनि व्यापार या शिक्षा से आय पाने वाला, मानसिक रूप से चिड़चिड़ा और चिंतित होता है। असंतोष व दुर्भाग्य से पीड़ित रहता है। मेहनत का फल नही मिलता है।
4. कर्क का शनि कामचोर, आलसी, कंजूस माता के सुख से विहीन करता है। जलनखोर तथा आवास परिवर्तन कराता है। यात्रा वाले जाॅब करता है।
5. सिंह मे शनि राजा से लाभ, कार्यदक्ष, चतुर, लेखक, टीचर व धनवान बनाता है। अनेक समस्यायें साथ रहती है। विदेशो मे यश मिलता है।
6. कन्या का शनि व्यापार या शिक्षा से आय पाने वाला, मानसिक रूप से चिड़चिड़ा और चिंतित होता है। परोपकारी, लेखक, आलोचक व धनवान बनाता है। कंजूस निर्धन, दुःखी, एकाकी जीवन जीने वाला, बनाता है।
7. तुला का शनि उच्च को होता है। जो उच्च स्तर का जाॅब देता है। लोकप्रिय, यशस्वी बनाता है। उन्नति करवाता है। सम्मानित लोंगों से सम्पर्क करवाता है।
8. वृश्चिक का शनि मशीनों व औषधि से आय देने वाला, लोभी क्रूर व दृढप्रतिज्ञ होता है।
9. धनु का शनि सम्मानित पद, उच्च पद देता है। विचारक दानी, दयालु, सदाचारी, व्यवहार कुषल बनाता है। उसे धर्म और भौतिक साधनों से लगाव नही होता है।
10. मकर का शनि स्वराशि है। महत्वाकांक्षी, कूटनीतिज्ञ होता है। शत्रु नहीं होते है। वैवाहिक जीवन खराब रहता है। झूठा, असन्तुष्ट, अशिक्षित होता है।
11. कुंभ का शनि जातक को विनम्र धनी, उदार, शत्रुहन्ता, दीर्घायु ,सम्मानित बनााता है संतान सुख मे कमी लाता है। और दुर्घटनायें कराता है।
12. मीन का सम्मानित, दो से अधिक स्त्रोतों से आय पाने वाला, शांतिप्रिय सहनशील बनाता है। वैवाहिक जीवन में असन्तुष्ट व निराश रहता है। परोपाकारी व विचारक होता है। दैवज्ञ या भविष्यवक्ता हो सकता है।