सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

खेट कौतुकम: महाज्योतिषी रहीम की कृति

आचार्य चाणक्य का कथन है कि वैसे तो मलेच्छ निन्दनीय है। किन्तु ज्योतिश ज्ञान के कारण पूजनीय है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भारत मे ज्योतिश का अध्ययन किया मुस्लिम विद्वान भी इसमे पीछे नही है। इनमे अलबरूनी, नवाब अब्र्दुर रहीम खानखाना, अमीर खुसरो तथा मलिक मुहम्मद जायसी प्रमुख है। अमीर खुसरो तथा मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी रचनाओं मे ज्योतिश का वर्णन किया है। जायसी की काव्य रचना पद्यमावत और कान्हावत मे कई जगह ज्योतिष का उल्लेख है। अलबरूनी और रहीम जी ने भारतीय ज्योतिषी पर कई स्वतंत्र ग्रन्थों की रचना की। रहीम दास जी शहंशाह अकबर के प्रधान सेनापति बैरम खान के पुत्र थे उनका जंम संवत 1610 यानि सन 1556 में हुआ था उन्हें पाटन (गुजरात) की तथा कई अंय जागीरें मिली थी वे संस्कृत, अरबी, उर्दू, फारसी, हिन्दी, ब्रज, अवधी आदि कई भाषाओं के विद्वान थे वे कृष्णभक्त,  महान दानी और परोपकारी थे उनके द्वार से कोई खाली नही जाता था फिर भी उनमे जरा भी मद नही था वे ईश्वर को ही असली दाता बताते थे
 देनदार कोई और देत रहे दिन रैन।
 लोग भरम मों पर करै याते नीचे नैन।। 
 अकबर के बाद जहांगीर किसी कारण उनसे नाराज हो गया और उनकी सारा जायदाद जब्त कर ली तो इसे वे सहज भाव से परमात्मा की इच्छा मानकर सब कुछ त्याग कर ज्योतिष, ईशभक्ति और जनसेवा मे लीन हो गये। उसी दौरान उन्होने ज्योतिष ग्रन्थों की रचना की। उनके लिखे दो ज्योतिष ग्रन्थ पाये जाते हैं। ,खेट कौतुकम और द्वात्रिशंति योगावली। खेट कौतुकम का अर्थ है खेट यानि ग्रह और कौतुकम तथा खेल या चमत्कार। यह लघु ग्रन्थ दो भागों मे विभाजित है। पहला भाव फलाध्याय और दूसरा राजयोगाध्याय पहले भाग मे 99 और दूसरे भाग मे 25 श्लोक है। उसमे संस्कृत के साथ अरबी और फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। ग्रन्थ के प्रारंभ मे उन्होने कहा है। पूर्व मे अरबी ज्योतिषियों जिन्होंने फारसी व संस्कृत मिश्रित श्लोकों के आधार पर ज्योतिष ग्रन्थ बनाये थे मैं उनकी की परम्परा का पालन करता हूँ भावफलाध्याय मे कुण्डली के 12 भावों मे  स्थित सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों के फलों का वर्णन है। जैसे तनु आदि 12 मे सूर्य का फल, फिर चन्द्रमा का फल फिर मंगल आदि का फल। कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत हैं।
लग्नस्थ सूर्य का फल
 सूर्य यदि लग्न मे हो तो जातक दुबला, स्त्री से अपमानित, दुर्जन संतान वाला, यदि सूर्य नीच का हो तो ईष्यालु, बदनाम व दुष्ट होता है।
 लग्नम सम्शखेट स्तदा लागरः
 कामिनीदुषितो दुष्प्रजौ वै तदा।
 पण्यरामारतौ राशिमीजन्गतौ।।
 मानहीनोअथ हीर्षी विदृष्टि पुमान।।
 द्वितीयस्थ सूर्य 
 यदा चश्मखाने भवेदाफताब
 स्तदा ज्ञानहीनोअथ गुस्स्वम मुददाम।
 सदातंगदिल्शख्तगो द्रव्यहीनः।।
 कुवेेषो गदा स्याद्वेशहोशो दिवासासम।।
द्वितीय भाव का सूर्य मूर्ख, क्रोधी, विसेधी, कृपण, द्ररिद्र, कुरूप, रोगी व भुलक्क्ड़ बनाता है।
नवम भावस्थ गुरू
 हजरते च खुशपरिजन वाँश्च
 खूबरो बहुसुखी च।।
 आमिलश्च यदि बख्तखा
 मुश्तरी प्रविभवेत्खलु यस्य।।
कुलीन, भाग्यवान, सुन्दर, सुखी, यशस्वी, ईश्वर भक्त व धनसम्पन्न होता है।
खेट कौतुकम ग्रन्थ का दूसरा खण्ड राजयोगाध्याय है।
इसमे कुण्डली के विविध ग्रहों के स्थित होने से जो राजयोग बनता है। उनके अनुसार सदि आठवे भाव मे शुक्र, द्वितीय भाव मे गुरू मथा लग्न मे राहू हो तो जातक चक्रवर्ती राजा होता है। आयु खाना 8 वां भाव, मालखाना धन भाव, पैदाम लग्न।
 आयुखाने चश्मखोरा मालखाने च मुश्तरी।
 राहू जो पैदामकाने शाह होवे मुल्कका।।
 इसी तरह गुरू यदि कर्क या धनु राशि तथा शुक्र द्वितीय या दशम भाव मे हो मतो जातक बादशाह होगा
 यदा मुश्तरी कर्कटे वा कमाने
 यदा चश्मखोरा जमी वासमाने।
 तदा ज्योतिषी क्या लिखे क्या पढेगा
  हुआ बालका बादशाही करेगा।।
कमान धनु राशि, जमीन द्वितीय भाव जिससे जायदाद का विचार होता है। आसमान दशम भाव चश्मखोरा शुक्र।
व्यय भाव के राहू का फल
 स्थितो यदा यस्य खर्चखाने भवेदत्त वा।
 कलहप्रिय वेकर कर्ज मन्दरश्य मुफलिस।।
जिसके 12 वंे भाव मे राहू हो वो झगड़ालु, निर्धन  कर्ज लेने वाला तथा समय गँवाने वाला होता है।
उन्होनें अपने नीतिपरक दोहांे में बड़ी कुशलता से ज्योतिष का समावेश किया है।
कदली सीप भुजंग मुख, स्वाती एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिये,  तैसोई फल दीन।। 
 संगत का प्रभाव अवश्य पडता है। स्वाती नक्षत्र का मेघ जल केले के पेड़ मे गिरता है तो कपूर , सागर की सीप मे गिर कर मोती व सर्प मुख मे गिर कर विष बन जाता है। इनके दूसरे ग्रन्थ द्वात्रिशंति योगावली मे वर्षफल के 32 योंगो का वर्णन है। योंगों के नाम उड़िया या फारराी मे है। इसमे  चीन योग का वर्णन है। वर्षफल ज्योतिष मे ताजिक वर्षफल ग्रन्थाकार को छोड़ कर केवल रहीम का ही नाम आता है।


इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पक्षी आपका भाग्य बदले

मनुष्य का जीवन अपने आसपास के वातावरण से ही प्रभावित होता है। व्यक्ति के आस-पास के पशु पक्षी उसके जीवन का अभिन्न अंग है। भारतीय ऋर्षियों तथा संसार के अध्यात्मवादियो ने संसार के पक्षियों को ना केवल ज्योतिष तथा मनुष्य के भाग्य से जोड़ा है। बल्कि पक्षियों को उपयोग शकुन ज्योतिष, फलित तथा प्रष्न ज्योतिष तथा अनेकों ज्योतिष, तांत्रिक उपचारों और शारीरिक मानसिक रोगों के निवारण में किया है। भारत मे पंच प़क्षी शास्त्र, कल्ली पुराण पर आधारित तोते द्वारा भविष्यवाणी, पक्षी तंत्र तथा शकुन ज्योतिष का प्रयोग आदिकाल से ही किया जाता है भारत मे गरूड़ जी, नीलकंठ, काकभुषुंडी,, हंस, जटायु व संपाती, शुकदेव जी आदि दिव्य पक्षियों तथा अनेक देवी देवताआंे वाहन के रूप मे पक्षियों को प्रयोग किये जाने का  वर्णन है। जैसे भगवान विष्णु का गरूड़, कार्तकेय जी का मयूर, माता लक्षमी का उल्लू, विश्वकर्मा, वरूण जी तथा स्वरसती जी का हंस आदि शनिदेव का कौआ आदि का प्राचीन काल मे पक्षियों द्वारा डाक सेवा युद्ध संबधी शकुन का भी काम लिया जाता था पक्षियों को स्वतंत्रता, नवीन विचारों, आनंद, तनाव, मुक्ति, प्रषंसा, यष, धन्यवाद देने, प्रजनन श

परिवर्तन योग से करें भविष्यवाणी

भारतीय ज्योतिशशास्त्र में भविष्यकथन के सैकड़ों सूत्रो का वर्णन है। इन्ही सूत्रों मे से एक है परिवर्तन योग जिसका वर्णन पाराशरीय और नाड़ी ग्रन्थों दोंनों मे पाया जाता है। हाँलाकि दोनो प्रकार के ग्रन्थों में इन सूत्रों को विभिन्न तरीको से प्रयोग किया गया है ज्योतिष मे परिवर्तन योग के तीन रूप पाये जाते हैं। 1. भाव परिवर्तन 2. राशि परिवर्तन 3. नक्षत्र परिवर्तन  भाव परिवर्तन पाराशरीय व कुछ नाड़ी ग्रन्थों जैसे षुक्र नाड़ी मे इसके सूत्रो का वर्णन पाया जाता है। जो भावा के स्वामियो के बीच स्थान परिवर्तन से बनता है। जैसे चतुर्थेश षष्ठ भाव मे जाय और षष्ठेश चतुर्थ भाव मे जाय। इसके भी तीन भेद हैं। 1. दो शुभ भावों के स्वामियों का परस्पर परिवर्तन जैसे लग्न व पंचम भाव का परिवर्तन या दो केन्द्रेशों का परिवर्तन या केन्द्र और त्रिकोण भाव मे परस्पर परिवर्तन। 2. दो त्रिकेशांे का परिवर्तन जो विपरीत राजयोग बनाता है। 3. किसी केन्द्रेश या त्रिकोणेश का त्रिकेश से परिवर्तन। जैसे दशमेश का द्वादेश से परिवर्तन या पंचमेश या द्वादेश के बीच परिवर्तन। 2. ग्रह या राशि परिवर्तन  इसका वर्णन स्व. आर. जी. राव द्वारा अनुवादित और

जेल जाने के योग

ज्योतिष शास्त्र अनुसार कुंडली के आठवें मतांतर से बारहवें भाव से कारावास तथा सजा का विचार किया जाता है। कुंडली के इस घर में राहु अगर अष्टमेश के साथ हो तो उसके अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को किसी बड़े अपराध के कारण जेल जाना पड़ता है। शनि  मंगल और राहू मुख्य रूप से यह तीन ग्रह एवम् इनका आपसी सम्बन्ध जेल के कारक है। शनि व 12 भाव सजा का कारक है। छठा भाव व मंगल राहू अपराध के कारक है। अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में मंगल और राहु एक साथ किसी भाव में बैठकर युति करते हैं तो जेल योग बनता है केतु रस्सी बेड़ी हथकड़ी का कारक ग्रह हैं अशुभ मंगल व राहु के बीच दृष्टि संबंध बनता हो तो अंगारक योग की वजह से ऐसा इंसान हिंसक स्वभाव वाला हो जाता है और अपराध करता है जिससे जेल जाना पड जाता है। शनि मंगल व राहु मुख्य रूप से जेल यात्रा कराने का भी योग बनाते हैं और इनकी युति या आपस में दृष्टि इस तरह की स्थितियां बना देती है कि आखिर इंसान को जेल जाना ही पड जाता है। जन्मकुंडली में सूर्यादि ग्रह समान संख्या में लग्न एवं द्वादश तृतीय एवं एकादश, चतुर्थ, दशम, षष्ठ एवं अष्टम भाव में स्थित हो तो यह बंधन योग बनाता है यह स्थिति