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नाड़ी ज्योतिष में षष्ठाठक योग

जब जंमाक मे दो या अधिक ग्रह एक दूसरे से छठे व आठवें भाव मे होते है। दो ग्रहों के इस संबध को षष्ठाठक योग कहते हैं।। एक अन्य योग षष्ठाठक योग का ही फल देता है। वह द्विदादश योग है जब कोई ग्रह दूसरे ग्रह से 12वें भाव मे होता है। तो द्विदादश योग बनता है। पाराशर संहिता का यह सूत्र जब कोई ग्रह दूसरे ग्रह से 6. 8. 12 वें भाव मे हो वह प्रथम ग्रह विनाश करता है। और दोनो परस्पर शत्रुवत व्यवहार करते है। इनकी व्याख्या पाराशर पद्धति और नाड़ी पद्धति मे अलग-अलग तरीके से की जाती है।
पाराशर मत:- पाराशर पद्धति मे मुख्यतः इसका प्रयोग दो भावेशों के अशुभ संबध को बताने के लिये किया जाता है। कुछ व्याख्यायें इस प्रकार है।
1. यदि लग्नेश और सप्ततमेश परस्पर षष्ठाठक हो तो  जातक अपनी पत्नी या पति की के विचारांे और भावनाओं को अस्वीकार करेगा या ताऊ, बुआ, व्यापारिक पार्टनर से हानि देगा
2. यदि लग्नेश और पंचमेश परस्पर षष्ठाठक हो तो  जातक के अपने पुत्र, पुत्री या अधीनस्थ कर्मचारियों से मतभ्ज्ञेद रहेंगें और वे करेगा परस्पर शत्रुवत व्यवहार करगें।
3. उपरोक्त सूत्र सामान्य है और लग्नेश का किसी भी भावेश से षष्ठाठक या द्विदादश संबध जातक के अन्य भाव के रिश्तेदार से कटु संबध देगा। जैसे लग्नेश नवमेश पिता या उच्चाधिकारी से, लग्नेश लाभेश हो तो बड़े भाई या बड़ी बहन, चाचा, बुआ, दामाद या बहु से, लग्नेश तृतीयेश, छोटे भाई या बहन, पड़ोसी, ससुर, चचेरे या फुफेरे भाई या बहन से, लग्नेष शश्ठेष मामा मौसी से संबध कटु हों।
भृगु नाड़ी ज्योतिष के षष्ठाठक योग-
 स्व. आर. जी राव द्वारा रचित 'भृगु नन्दी नाड़ी' मंे कुछ विशेष षष्ठाठक योगों का वर्णन है। जो कारक ग्रहों पर आधरित है।
प्रत्येक ग्रह कुछ खास वस्तुओं और संबधियों का कारे ग्रह है। जब दो ग्रह परस्पर षष्ठाठक संबध बनाये तो दोनों ग्रहों की कारक वस्तुओं का जातक को सहयोग नही मिलेगा और जीवन मे दुर्भाग्यपूर्ण घटनायें घटेगीं। भृगु नाड़ी मे द्विदादश संबध को सभी जगह बुरा नही माना गया है इसे वही अशुभ बताया गया है। जब द्विदादश संबध बनाने वाले ग्रह परस्पर शत्रु हों।
भृगु नाड़ी के महत्वपूर्ण षष्ठाठक योग-
1. शनि-चन्द्र का  द्विदादश योग या षष्ठाठक योग। इस दोष का वर्णन भृगु संहिताः प्रैडिक्टिव टैकनिक डिस्फेरेड के लेखक शंकर अडवाल ने किया है। जिसे उनके पिता श्री रमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने होषियारपुर, पंजाब की भृगु संहिता से संग्रहित किया था शनि चन्द्र का योग विष कहलाता है। जो पुरूषों मे निराशा के दौरे तथा रोजगार मे मंदी, गिरावट और यात्राकारी जाॅब देता है। और महिला जातक मे यह निराशा के दौरे के साथ मासिक धर्म मे गड़बड़ी, स्त्रियों के रोग, हारमोनल डिस्टरबेंन्स देता है। कमर दर्द, संतान प्राप्ति मे बाधा, हिस्टीरिया, अति क्रोध देता है भृगु नाड़ी मे इसे पिशाच पीड़ा योग कहा गया है। लेकिन पंजाब की भृगु संहिता मे इसे वैवाहिक जीवन मे मंगली दोष के समान अतिघातक माना गया इस दोश से युत अनेक कुण्डलियों सौ फीसदी असाध्य संतानहीनता, तलाक, पति या पत्नी मे से किसी एक को अति लंबी गंभीर बीमारी, या विधवा या विधुर बनाता है।
2. गुरू शनि यदि परस्पर 6 या 8 वें भाव मे हो तो अचानक जातक का आर्थिक और समाजिक पतन हो जाता है।
3. यदि मंगल शनि से 6 वें भाव मे हो तो जातक को उसके जाॅब मे शत्रु सक्रिय होंगें और जाॅब मे घाटा होगा दोनो परस्पर षष्ठाठक हो तो दुःमरण व दुर्घटना योग बनाये।
4. सूर्य और चन्द्रमा परस्पर  6 या 8 वें भाव मे हो तो जातक के माता पिता के मध्य मतभेद होंगें।
5. यदि मंगल और शुक्र परस्पर  6, 8 या 12 वें भाव मे हों या गुरू और शुक्र परस्पर  6 या 8 वें भाव मे हों तो जातक के अपनी या पति से मतभेद होंगें।
6. यदि शुक्र मंगल या गुरू से 12 वें भाव मे हो जातक को अपनी गत जंम की पत्नी, पुत्री व छोटी बहन ही इस जंम मे प्राप्त होगी। 
7. यदि मंगल शुक्र से 12 वें भाव मे हो जातिका को अपने गत जंम का भाई और पति ही इस जंम मे प्राप्त होगा।  
8. गुरू से 12 वें भाव के ग्रह का प्रतीक संबधी उसे इस जंम मे भी प्राप्त होगा जैसे 12 वें सूर्य हो तो पुत्र व पिता, चन्द्रमा हो तो माता, मंगल हो तो भाई, बुध मामा व मित्र, राहू हो जो गत जंम मे धोर पापी हो यदि शनि हो अति प्रतिष्ठित व्यक्ति होगा केतु हो तो गत जंम मे महात्मा या दिव्यात्मा होगा। 
9. गुरू से 6, 8, 12 वें भाव मे सूर्य जातक के पिता व पुत्र से, मंगल भाई से शुक्र पत्नी, बहन, पुत्री, बुध हो तो मामा या मित्र से, चन्द्रमा माता से मतभेद देगा।
10. यदि मंगल और राहू या शनि और राहू परस्पर  6 या 8 वें भाव मे हो तो नाग (सर्प) का षाप हो।  यदि मंगल और केतु या शनि और केतु परस्पर  6 या 8 वें भाव मे हो साधू का शाप हो।


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