कश्मीर का इतिहास और समस्या

आज कष्मीर का महत्व औरा बढ़ गया है, आजादी के बाद से ही कश्मीर का मामला काफी अहम् रहा। इसके लिए कष्मीर का इतिहास जनना आवष्यक है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और अखण्ड भारत की एकता के प्रतीक सरकार बल्लभभाई पटेल जिस जम्मू और कश्मीर रियासत का भारत संघ में पूर्ण विलय का काम अधूरा छोड़ गए थे उसे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह कर गए। मोदी सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 की विभिन्न धाराओं के निरस्त तथा संविधान की धारा 3 के तहत जम्मू-कश्मीर के विखण्डन की प्रक्रिया शुरू किए जाने के साथ ही अब तक विशेषाधिकार प्राप्त रहे जम्मू और कश्मीर के भारत संघ में पूर्ण विलय की प्रक्रिया शुरू हो गई है। भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत इस राज्य का पूर्ण विलय हुआ ही नहीं था और इसकी सम्प्रभुता केवल महाराजा हरि सिंह और गवर्नर जनरल माउण्टबेटन के बीच हुए 'इंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेशन' के तहत ही भारत संघ में निहित थी। जब रियासत के ही टुकड़े हो जाएगे तो उसके अपने अलग संविधान का भी कोई अस्तित्व नहीं रह जायेगा। दरअसल, शायद कभी किसी ने सोचा भी न होगा कि कहां तो जम्मू-कश्मीर के लोगों को मौजूदा स्वायत्तता और विशेषाधिकार कम पड़ रहे थे और वे 1965 से पहले की स्थिति की मांग कर रहे थे और कहां उनका पूर्ण राज्य का दर्जा भी छिन गया। उनका पूर्ण राज्य का दर्जा ही नहीं छिना बल्कि उन्हे पार्ट-सी का उपराज्य बनाने के साथ ही सीधे केन्द्र सरकार के नियंत्रण में रख दिया।
 कानून व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी होती है और यही सत्ता की प्रतीक भी होती है। लेकिन दिल्ली की तरह जम्मू-कश्मीर के लोगों के हाथो से यह शक्ति भी छिन गई है। यही नहीं अब दिल्ली की ही तरह रियासत के लोगों द्वारा चुनी गई सरकार पर दिल्ली से नियुक्त उप राज्यपाल की ही बादशाहत चलेगी।
 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की एनडीए सरकार ने आखिरकार एक देश एक कानून के एजेंडे की घोषणा के अनुरूप जम्मू-कश्मीर और उसके नागरिकों को विशेषाधिकार देने वाले अनुच्छेद 370 की खण्ड एक को छोड़कर अन्य विभेदकारी उपधाराएं समाप्त करने का कदम उठा ही लिया। अब जम्मू-और कश्मीर के नागरिकों को केवल वही अधिकार प्राप्त होंगे जो कि देश के अन्य नागरिकों को प्राप्त होते हैं। अब भारत सरकार को बार-बार राज्यपाल शासन भी नहीं लगाना पड़ेगा, क्योंकि वह राज्य अब सीधे केन्द्र सरकार के नियंत्रण में होगा। अगर जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होते तो जो व्यवस्था पिछले 72 सालों से चल रही थी उसे समाप्त करने की जरूरत ही महसूस नहीं की जाती। वहां हुर्रियत के नेता खाते हिन्दुस्तान के थे लेकिन उनकी वफादारी पाकिस्तान के साथ थी। पहले तो आम आदमी न्यूट्रल था लेकिन आज वहां भारत विरोधी प्रवृत्ति चरम पर पहुंच गई थी। लोग आतंकवादियों को बचाने के लिए कवच की तरह सुरक्षा बलों के आगे खड़े हो रहे थे और जिन युवाओं के हाथों में कलम या कम्प्यूटर का माउस होना चाहिए था उनके हाथों में पत्थर आ गए थे।
 भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत भारत में मौजूद 562 देसी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलीन करने की जो प्रक्रिया अपनाई गई थी, उसके तहत जम्मू-कश्मीर के विलय की प्रक्रिया ही अपूर्ण थी और उसी अपूर्णता के कारण इस रियासत को अपने साथ बनाए रखने के लिए उसे विशेष रियायतें या राज्य को विशेष संवैधानिक दर्जा देना पड़ा था। उस संक्रमण काल में सबसे पहले जो जैसा है की स्थिति बरकरार रखने के लिए इन रियासतों के साथ 'स्टैण्ड स्टिल' समझौते किए गए मगर भारत सरकार ने महाराजा हरि सिंह के साथ यह समझौता नहीं किया। इसके बाद जब तक राजा महाराजाओं या नवाबों को पूर्ण विलय के लिए मनाया जाता या विवश किया जाता तब तक उनसे ''इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन'' पर हस्ताक्षर कराए गए ताकि देशी शासकों का अपने राज्यों पर शासन बरकरार रखने के बावजूद ब्रिटिश क्राउन में निहित उनकी सार्वभौम सत्ता को भारत संघ में निहित कर उन्हें अपने पक्ष में बने रहने के लिए पाबंद किया जा सके।
 भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 (इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया एक्ट 1947) के तहत ब्रिटिश शासित क्षेत्र के भारतवासियों को स्वशासन सौंपे जाने के साथ ही देसी रियासतों पर भी ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता समाप्त हो गई थी, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से देशी राज्यों के साथ हुई संधियों के तहत उनकी सुरक्षा की गारंटी और बदले में ब्रिटिश पैरामौंटसी (अधीनता) भी समाप्त हो चुकी थी। इसलिए महाराजा हरि सिंह समेत अधिकांश नरेश स्वयं को सम्प्रभुता सम्पन्न अधिनायक मानने लगे थे। फिर भी ब्रिटिश संसद में वहां के एटार्नी जनरल ने स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश सम्राट-साम्राज्ञी इन रियासतों को पृथक अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता देने को तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर, नेहरू जी भी साफ कह चुके थे कि अगर कोई देश इन रियासतों को मान्यता देगा तो उसे शत्रुतापूर्ण कार्यवाही माना जाएगा। सरदार पटेल के अनुरोध पर तत्कालीन गर्वनर जनरल लाॅर्ड माउंटबेटन ने 25 जुलाई 1947 को चैम्बर ऑफ प्रिंसेज के अधिवेशन में साफ कह दिया था कि देसी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ मिल जाना चाहिए। गर्वनर जनरल ने साफ कह दिया था कि ऐसी भौगोलिक परिस्थितियां हैं जिनके चलते सुरक्षा और सुव्यवस्था की दृष्टि से देसी रियासतों को अपने से जुड़े ब्रिटिश शासित रहे प्रान्तों में मिलने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं है, इसलिए 15 अगस्त 1947 तक हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर जैसे कुछ बड़े राज्यों को छोड़ कर टिहरी समेत 136 रियासतों ने इंट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर कर दिए थे।
 पाकिस्तान समर्थित हजारों हथियारबंद कबाइली जब 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर में दाखिल हो गए और तेजी से राजधानी श्रीनगर की तरफ बढ़ने लगे तो कश्मीर के पुंछ इलाके में महाराजा के शासन के प्रति पहले से ही काफी असंतोष था, इसलिए इस क्षेत्र के कई लोग भी हमलावरों के साथ मिल गए। 24 अक्टूबर को कबाइलियों के बारामूला की ओर बढ़ने पर महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार से सैन्य मदद मांगी तो अगली ही सुबह तत्कालीन सेक्रेटरी स्टेट वीपी मेनन को हालात का जायजा लेने दिल्ली से कश्मीर भेजा गया। मेनन जब महाराजा हरि सिंह से श्रीनगर में मिले तब तक हमलावर बारामूला पहुंच चुके थे। ऐसे में उन्होंने महाराजा को तुरंत जम्मू रवाना हो जाने को कहा और वे खुद कश्मीर के प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन को साथ लेकर दिल्ली लौट आए। इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने अपनी पुस्तक 'इंडिया आफ्टर गांधी'' में लिखा है कि ऐसे में लार्ड माउंटबेटन ने सलाह दी कि कश्मीर में भारतीय फौज को भेजने से पहले हरि सिंह से 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर करवाना चाहिए, इसलिए मेनन को एक बार फिर से जम्मू भेजा गया और 26 अक्टूबर को मेनन महाराजा हरि सिंह से 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर कराकर तुरंत ही दिल्ली वापस लौट आए। अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही भारतीय फौज कश्मीर के लिए रवाना हो गई। इसी दिन 28 विमान भी कश्मीर के लिए रवाना हुए और कुछ ही दिनों में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों और विद्रोहियों को खदेड़ दिया गया।
 महाराजा हरि सिंह द्वारा 26 अक्टूबर 1947 को 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर करने के बाद अगले ही दिन गवर्नर जनरल लुइस माउण्टबेटन ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के साथ ही कश्मीर पर भारत का औपचारिक, व्यवहारिक और आधिकारिक कब्जा हो गया। लेकिन कुछ चीजें अब भी अनसुलझी इसलिए रह गईं क्योंकि विलय की कुछ औपचारिकताएं अधूरी रह गई थीं। क्योंकि भारत ने कश्मीर के महाराजा हरी सिंह के साथ जिस 'इंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर किए थे, वह अक्षरशः वैसा ही था जैसा मैसूर, टिहरी गढ़वाल या किसी भी अन्य रियासत के साथ किया गया था। लेकिन जहां बाकी रियासतों के साथ बाद में 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ मर्जर' पर हस्ताक्षर कराए गए, जबकि कश्मीर के साथ भारत के संबंध उलझते चले गए। इन संबंधों के उलझने की एक बड़ी वजह थी कश्मीर में जनमत संग्रह का वह वादा जिसकी पेशकश लार्ड माउंटबेटन ने की थी। 27 अक्टूबर 1947 को 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर करने के साथ ही गवर्नर जनरल ने महाराजा हरि सिंह को पत्र लिखकर कहा था कि 'मेरी सरकार की इच्छा है कि कश्मीर की धरती से आक्रमणकारियों से मुक्त कराने के बाद रियासत के भारत में विलय के बारे में जनता की राय भी ली जाएगी। उस समय भारत आजाद तो हो गया था मगर हमारा संविधान 26 जनवरी 1950 को ही लागू हो सका, इसलिए तब तक ब्रिटिश कानून के चलते गवर्नर जनरल के रूप में माउण्टबेटन ही शासन के प्रमुख थे इसलिए भारतीय नेतृत्व उनकी कही बात नकार नहीं सका। नकारना तो रहा दूर माउण्टबेटन के इस वादे को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बाकायदा आल इंडिया रेडियो पर दुहरा गए। यही नहीं माउण्टबेटन की सलाह पर भारत यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में भी ले गया और वहां उसकी पैरवी पाकिस्तान के मुकाबले काफी कमजोर रही। कमजोरी का कारण भारत में होने वाले साम्प्रदायिक दंगे भी थे। इस तरह शासन प्रमुख के तौर पर अंग्रेज गवर्नर जनरल का वायदा भविष्य के लिए भारत के लिए गले की हड्डी बन गया। 
 इंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेशन' के तहत नई शासन व्यवस्था में देसी रियासतों  पर उनके शासकों का अधिपत्य तो था मगर संधि के तहत 18 ऐसे विषय थे जिन पर भारत अधिराज्य की विधायिका कानून बना सकती थी। इसका मतलब साफ था कि ये विषय भारत अधिराज्य के अधीन आ गए थे जिनमें रक्षा, विदेश मामले, संचार, मौद्रिक व्यवस्था, कस्टम, प्रत्यारोपण, सिंचाई, बिजली, आवश्यक वस्तुओं पर नियंत्रण, राष्ट्रीय राजमार्ग, नमक, रेलवे, डाक एवं तार, केन्द्रीय उत्पाद कर, अफीम और मोटर वाहन आदि शामिल थे। लेकिन इन विषयों के अलावा बाकी विषय देशी राज्यों के पास ही रखे गए। संविधान की धारा 370 के अनुसार भारतीय संसद जम्मू-कश्मीर के मामले में सिर्फ तीन क्षेत्रों-रक्षा, विदेश मामले और संचार के लिए कानून बना सकती है। इसके अलावा किसी कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र सरकार को धारा 371 के खण्ड एक के तहत राज्य सरकार की मंजूरी चाहिए होती है। संविधान सभा में गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप पेश किया था। बाद में यह धारा 370 बनी। इन अनुच्छेद के तहत जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिले। 1951 में राज्य को संविधान सभा अलग से बुलाने की अनुमति दी गई। संविधान सभा की पहली बैठक 31 अक्टूबर 1951 को हुई थी। जम्मू एवं कश्मीर के संविधान को बनने में कुल 5 वर्ष का समय लगा। नवंबर 1956 में राज्य के संविधान का कार्य पूरा हुआ। 26 जनवरी 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया।
 जम्मू-कश्मीर देश का अकेला राज्य है जिसका अपना अलग संविधान और अलग झण्डा था तथा इसकी विधानसभा की अवधि 6 साल थी। सितम्बर-अक्टूबर 1951 में जम्मू एवं कश्मीर की संविधान सभा का निर्वाचन राज्य के भविष्य के संविधान के निर्माण के लिए तथा भारत के साथ सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए किया गया था। इस संविधान की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं की गई है। अमित शाह के बयान के मुताबिक 370(1) बाकायदा कायम है सिर्फ 370 (2) और (3) को हटाया गया है। 370(1) में प्रावधान के मुताबिक जम्मू और कश्मीर की सरकार से सलाह करके राष्ट्रपति आदेश द्वारा संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों को जम्मू और कश्मीर पर लागू कर सकते हैं। 370(3) में प्रावधान था कि 370 को बदलने के लिए जम्मू और कश्मीर संविधान सभा की सहमति चाहिए। राष्ट्रपति के आदेश से जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा भंग कर दी गई है और उसके अधिकार विधानसभा को दे दिए हैं। चूंकि इस समय विधानसभा भी भंग हो गई और उसके कार्य एवं दायित्वों का निर्वहन संसद कर रही है इसलिए राज्य विधानसभा वाला काम संसद कर सकती है। यही रास्ता मोदी सरकार ने निकाला है। लेकिन जब जम्मू-कश्मीर विशेष राज्य के दर्जे के साथ ही पूर्ण राज्य का दर्जा भी खो चुका होगा और सीधे केन्द्र सरकार के नियंत्रण में जा चुका होगा तो फिर उसके अपने अलग संविधान की भी प्रासंगिकता कहां रह जाती है?
 जम्मू-कश्मीर का संविधान अलग अवश्य है मगर वह राज्य का भारत संघ में स्थाई विलय का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है, जिसकी प्रस्तावना में कहा गया है कि, 'हम जम्मू एवं कश्मीर के लोग 26 अक्टूबर 1947 को राज्य के भारत संघ में विलय के अनुसरण में संघ के साथ राज्य के सम्बन्धों को पुनः परिभाषित करते हुए संकल्प लेते हैं कि राज्य भारत संघ का अभिन्न अंग है और बना रहेगा। राज्य के संविधान की इसी भावना के बल पर भारत विश्व बिरादरी में जम्मू कश्मीर पर अपना वैधानिक अधिकार जताता रहा है। देखा जाए तो जम्मू एवं कश्मीर की संविधान सभा का यह दस्तावेज ही भारत संघ में विलय का जनतम संग्रह है।
 जम्मू-कश्मीर समस्या के लिए कांग्रेस और खासकर नेहरू जी को जिम्मेदार बताने वाली भाजपा और विशेषकर गृहमंत्री अमित शाह ने ने जम्मू-कश्मीर पर एक के बाद एक विधेयक पेश करते हुए अमित शाह को कांग्रेस के विरोध के आगे स्वीकार करना पड़ा कि कश्मीर के विशेषाधिकारों को धीरे-धीरे घटाने का रास्ता धारा 370 के जरिये कांग्रेस ने ही उनको दिखाया था। उस समय जम्मू-कश्मीर को विशेष संवैधानिक दर्जा दिए जाने के पीछे राजनीतिक नेतृत्व की सोच थी कि समय के साथ सब कुछ सामान्य हो जाएगा या फिर धीरे-धीरे राज्य के अधिकारों को अन्य राज्यों के समकक्ष लाया जा सकेगा।


 


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