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त्रिशांशः अरिष्ट ज्ञान का सर्वोत्तम

बृहत पाराशर होराशास्त्र में 16 वर्ग चक्रों का वर्णन मिलता है। त्रिशंाश से जीवन के अरिष्ट, दुर्भाग्य के कारण, कलह, अशान्ति, अचानक पतन, रोग व दुर्घटनायें आदि का अध्ययन किया जाता है। और खेदशंाश से जीवन के शुभफलों को देखा जाता है। त्रिशंाश छठे भाव का उपवर्ग है। जो अचेतन मस्तिष्क पर काम करता है।
 ‘‘त्रिशंाशकोद्दरिष्टफलं खदेशंाशे शुभाशुभम।’’
 त्रिशंाश किसी भी राशि का 30 वाँ विभाजन है। इस चक्र में प्रत्येक राशि को पांच असमान भागों मंे बांटा जाता है। ये पांच विभाजन पांच प्रमुख ग्रहों के अधीन आते हैं। यह ग्रह मंगल, बुध, शुक्र, शनि और गुरू हैं। जो सृष्टि के पांच तत्वों के प्रतीक हैं। विषम राशि में प्रथम भाग 0-5 अंश मंगल का, द्वितीय भाग 5-10 अंश शनि मंे, तृतीय भाग 10-18 अंश गुरू मे, चैथा भाग 18-25 अंश बुध में और पंचम भाग 25-30 अंश शुक्र में आते हैं।     
सम राशि में प्रथम भाग 0-5 अंश शुक्र का, द्वितीय भाग 5-12 अंश बुध मंे, तृतीय भाग 12-20 अंश गुरू मे, चैथा भाग 20-25 अंश शनि में और पंचम भाग 25-30 अंश मंगल में आते हैं। 
त्रिशंाश चक्र के देवताः- विषम राशि मे प्रथम त्रिशंाश के देवता अग्नि, द्वितीय के वायु, तृतीय के इन्द्र, चतुर्थ के कुबेर पंचम  त्रिशंाश के वरूण है। विषम राशि मे प्रथम त्रिशंाश के देवता वरूण, द्वितीय के कुबेर, तृतीय के इन्द्र, चतुर्थ के वायु पंचम त्रिशंाश के अग्नि है। उपरोक्त पंाच तत्व पांच इन्द्रियों से सबंधित हैं। अग्नि दृष्टि, वायु स्पर्श, इन्द्र, आकाश श्रवण, कुबेर प्रथ्वी सुगंध, वरूण हैं। 
लग्न- चन्द्र लग्न या कोई ग्रह मंगल के त्रिशंाश में जाये तो पित्त विकार, भाई संपत्ति, पारिवारिक कलह, परिवार में दुर्भाग्य या परिवार मे कोई भीषण दुर्घटना बताता हैं। शनि त्रिशंाश में गये ग्रह रोग, मृत्यु, बंटवारा बताता है। गुरू का त्रिशंाश संतान द्वारा हानि, अपमान, अधिकारियों, पुरखों से प्राप्त दुर्भाग्य व विरासत में प्राप्त समस्याओं को बताता है।
बुध का त्रिशांश ठगी, जाली कागज, अशिक्षा, गलत निर्णयों से प्राप्त दुर्भाग्य, दीवालिया, व्यापारिक घाटे, वाणी दोष, गूंगे, बहरे, अपंगता के कारण कष्ट देता है। शुक्र का त्रिशंाश पत्नी, बहन, पुत्री, बहू या किसी स्त्रिी से दुर्भाग्य देता है। रोग, धन जेवर की चोरी या हानि, निर्धनता व शुक्र की वस्तुओं से हानि देता है।
 स्त्री जातक में त्रिशंाश में गये ग्रह स्त्री के चरित्र, स्वभाव, और जीवन की घटनाओं को बताता है।
 त्रिशंांश मे लग्न में गये ग्रह व लग्नेश जातक की स्वभावजन्य दोषों को बताता है। जो जातक में वैचारिक विकृति पैदा करके उससे विभिन्न पाप कराते है। जिनका फल जातक को भुगतना पड़ता है। मंगल क्रोध व अहंकार, राहू लालच,  शनि नशा, शुक्र काम वासना, बुध ईष्र्या, गुरू निन्दा, केतु भ्रम के प्रतीक हैं।
त्रिशंाश चक्र के विभिन्न भाव-
प्रथम-जातक की कमजोरियों, तथा आदतों से जंमी समस्यायें जैसे क्रोध में झगड़ा, वाणी दोष से बहस, जंमजात समस्यायें
द्वितीय- परिवार जन्य समस्यायें व दुर्भाग्य, विरासत में प्राप्त कर्जे, झगड़े और मुकदमे।
तृतीय-दुर्भाग्य से लड़ने का साहस, सहोदरो व पड़ोसी से प्राप्त समस्यायें। 
चतुर्थ-जातक के परिवार मे व्यवहार से उत्पन्न समस्यायें, संपत्ति।
पंचम-संतान द्वारा कष्ट, विकृत विचार, विचारों से उम्पन्न  सुख  या दुःख। 
षष्ठ- शत्रु, रोग, दुर्भाग्य।
सप्तम- समाज के प्रति अपराध, भाभी या समाज से उत्पन्न समस्यायें, वाहृय संसार।
अष्ठम- जंमजात कष्ट, गत जंमों  के पापों के फल जटिल व असाध्य रोग व समस्यायें । 
नवम-देव कोप, गुरू कोप या धार्मिक अपराधों के कारण दुर्भाग्य। 
दशम-बुरे कर्मों के कारण फल, विचारधारायें से पैदा शुभ व अशुभफल।
एकादश- लालच के कारण उत्पन्न समस्यायें।
द्वादश-अनिद्रा, आलस्य, यात्रा व विदेशों मे प्राप्त कष्ट।
त्रिशंाश के फल-
यदि लग्न, चन्द्र या कोई ग्रह मंगल के नवांश मे हों तो ज्वर, घाव, रक्त, गर्भपात, अग्नि गर्भक्षय, पित्त विकार, आपरेशन, शस्त्र से कष्ट, बिजली से कष्ट शनि का त्रिशंाश हो तो 
कैंसर, लकवा, श्वास रोग, गठिया दौरे, पागलपन, जटिल रोग, चोरी, तूफान, उँचाई से गिर कर हानि। इन्द्र गुरू के नवांश मे पीलिया, ब्राह्मण शाप, विवाह या सरकारी अधिकारी या अदालत से हानि, मोटापा, खून की कमी। बुध या कुबेर के त्रिशंाश में धनाभाव, स्मृतिनाश, मामा से कष्ट, पागलपन, नर्वस ब्रेक डाउन, त्वचा के रोग, जुर्माने, आर्थिक  अपराध मे घाटा। शुक्र के त्रिशंाश में किडनी, गुप्तांगों के रोग, बाढ, भारी वर्षा के कारण हानि, पथरी का रोेग। 
त्रिशांश चक्र के विशेष सूत्र-
1. त्रिशांश चक्र की लग्न में गये ग्रह या दृष्टि डालने वाले ग्रह, यदि कोई ग्रह ना हो तो  त्रिशांश लग्नेश व्यक्तित्व की कमी या गलत बुद्धि के कारण स्वदशा में दुर्भाग्य देगा
2. त्रिशांश लग्न में पाप ग्रह हो व त्रिशांश लग्नेश भी पापी ग्रह हो तो विवाह मे कष्ट आयेगा।
3. लग्न का षष्ठेश या अष्ठमेश जिस त्रिशंाश मे जाये उसका स्वामी ग्रह दुर्भाग्य देगा।
4. त्रिशांश चक्र के आठवें भाव के ग्रह गत जंम की कमजोरिया तथा अष्ठमेश उन दोषों का कारण बताता है।
 5. त्रिशांश चक्र में केन्द्र में बैठे ग्रह शुभफल देते हैं और 12
भाव के ग्रह स्वदशा मे अशुभफल देते हैं। 
6. त्रिशांश चक्र में लग्न में शनि, छठे भाव का मंगल व 8 वें भाव में बुध अशुभफल देते हैं। तथा दशम भाव के ग्रह अपने तत्व की कमी से वैचारिक दोष पैदा कर  दुर्भाग्य देते हैं।
7. जंम लग्न या चन्द्र लग्न या कोई ग्रह किसी तत्व की राशि में है और वह त्रिशंाश में अपने विपरीत तत्व की राशि मे जाता है तो वह स्वदशा में हानि देेगा।
8. त्रिशांश चक्र में ग्रहों की नैसर्गिक दशा आश्चर्यजनक फल देते है। यदि उपरोक्त ग्रह अशुभ त्रिशांश चक्र में हो तो अपने समय मे अशुभफल देते हैं। नैसर्गिक दशा में 5-12 वर्ष की आयु बुध में, 13-32 वर्ष शु़क्र, 35-50 गुरू में आदि।
9. त्रिशांश चक्र में 8 वें भाव में शुभ ग्रह हो या उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो या अष्ठमेश शुभ ग्रह हो तो जातक की मृत्यु शुभ, प्राकृतिक व धार्मिक स्थान पर होगी यदि अष्ठमेश पाप ग्रह हो या पाप युत या दृष्ट हो तो जातक की मृत्यु अचानक,  जल, अग्नि या दुर्घटना मे होगी। यदि त्रिशांश लग्नेश शुभ ग्रह हो तो जातक की मृत्य शुभ व कष्टहीन होगी यदि त्रिशांश लग्नेश अशुभ ग्रह हो या  दृष्ट हो तो जातक की मृत्य दर्दनाक होगी यदि त्रिशंाश मे त्रिक मे शुभ ग्रह शान्त पूर्ण मृत्यु और पापी ग्रह दुर्घटना मे दर्दनाक मृत्यु हो।
10. त्रिशंाश लग्न से एक राशि बराबर एक भाव से गणना करो जिस भाव मे शनि हो उससे त्रिकोण राशि मे शनि का गोचर मृत्यु का वर्ष बतायेगा जैसे तृतीय भाव में शनि 3, 15,
27, 39, 51, 63 वर्ष में मृत्यु देगा 
11. त्रिशंाश में उच्च, स्वग्रही, मित्रगत, ग्रह शुभ फल देंगे यदि त्रिशांश लग्नेश केन्द्र त्रिकोण मे हो तो शुभफल दे त्रिशांश लग्नेश नीच, त्रिक मे या शत्रु राशि में हो गरीब, बदनाम, शत्रु पीड़ा। त्रिशांश लग्नेश मंगल हो तो जातक कुरूप, बुद्धिहीन, निर्दयी, क्रूर, वाणी दोष, दूसरांे का धन हड़पे। शनि हो तो, कृतघ्न, आलसी, अशिक्षित, लालची, पापी, नपुंसक, कुरूप हो। गुरू हो तो धनी, शिक्षित, आदर्शवादी, लेखक, दीर्घायु, गुणवान संततिवान, सम्मानित हो। बुध हो तो धनी, शिक्षित, धार्मिक, उदार, इत्र, पुष्प व सुन्दर कन्या का प्रेमी हो। शुक्र हो तो सुखी, धनी, सुन्दर, बुद्धिमान, सन्तों का भक्त, दयालु, उदार, भाषाविद। त्रिशांश चक्र में मंगल स्वग्रही हो तो बहादुर, सुखी वैवाहिक जीवन, शत्रुहन्ता हो। शनि हो तो रोगी, क्रूर, बदनाम, निर्धन, पापी संतान से दुखी, परस़्त्रीगामी। गुरू हो तो धनी यशस्वी बुध हो तो वक्ता, चालाक, धूर्त, तकनीकी ज्ञान, कलाप्रिय शुक्र हो तो सुन्दर, धनी। शुक्र पर पापी प्रभाव हो तो चरित्रहीन हो।
उपचार
1. कोई ग्रह कष्ट दे रहा हो तो उसके त्रिशंाश स्वामी की पूजा करें।
2. लग्न के षष्ठेश व अष्ठमेश जिस ग्रह के  त्रिशंाश में जाये तो उसके त्रिशंाश स्वामी की पूजा करें।
3. कष्ट देने वााले ग्रह के त्रिशंाश स्वामी की पूजा करें।
4. संजय राठ पुस्तक वर्ग चक्र के अनुसार यदि त्रिशंाश लग्न शनि की हो तो प्राणयाम करें और धूपबत्ती जलायें। गुरू की हो ध्यान करें व पुष्प चढायें। मंगल की हो तो दिया जलायें। शुक्र की हो तो दान, पूजन अभिषेक करंे। बुध की हो तो दिया जलाये व जप और कीर्तन करें।  


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