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बांग्ला लेखिका महाश्ेवता देवी सशक्त पहचान

1926 ढाका में जन्मी बांग्ला लेखिका महाश्ेवता देवी साहित्यकार और सामाजिक सेवक के रूप में सशक्त पहचान कायम किया। झांसी की रानी के चरित्र से वे बहुत अधिक प्रभावित हुई और उन पर उपन्यास लिखने का निर्णय कर लिया था। सन् 1956 की बात है जब महाश्ेवता की आयु 28 वर्ष थी। वे अकेली झांसी, ग्वालियर निकल पड़ी, वहाँ के लोगों से मिलकर उनकी बातें सुनी और लोक कथायें एकत्रित किया। महाश्ेवता देवी बांग्ला ही नहीं, पूरे देश की लेखिका रही। हिन्दी में भी उनकी लोकप्रियता थी उनके व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि वह लेखन से ही नहीं अपनी जीवनशैली से भी जनसामान्य से जुड़ी रही। 1947 में महाश्ेवता देवी का विवाह मशहूर रंगकर्मी विजन भट्टाचार्य से हुआ। सन् 1956 में झांसी की रानी पर लिखा उपन्यास ने उन्हे काफी ख्याति दिलाई। महाश्ेवता का वैवाहिक जीवन अधिक सफल नही रहा 1962 में विजन से रिश्ता टूटने के बाद उन्होने असीत गुप्त से शादी की, लेकिन यह सम्बन्ध भी 1975 में समाप्त हो गया। इसी बीच वह पश्चिम बंगाल, झारखण्ड़ और ओड़िसा के आदिवासियों के बीच एक सामाजिक कार्यकत्र्ता की भूमिका में अपनी पहचान बना चुकी थी। महाश्ेवता की चर्चित कृतियों में अरण्य का अधिकार, शालगिरह की पुकार पर, टेरोडेक्टिल, चोट्टिमुंडा और उसका तीर, अग्निगर्भ, हजार चैरासी की माँ, मास्टर साब, श्री श्री गणेश महिमा, तारार आंधार, आंधार माणिक, नील छवि आदि उपन्यास शामिल है। उन्होंने अनेकों कहानियों की भी रचना की है, जिनमें रूदाली, बाढ़, शिकार, बेहुला, द्रौपदी आदि चर्चित रही है।  महाश्ेवता देवी करीब ढ़ाई सौ कृतियों की रचना की,  जिनका कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। उपन्यास और कहानियों के साथ-साथ उन्होंने अन्य विधाओं में भी काफी लिखा। वर्तिका पत्रिका के संपादन संभालते हुए शोषितों के लिए एक मंच तैयार किया। महाश्ेवता देवी को 1979 में बिरसा मुंडा पर आधारित उनके उपन्यास ‘अरण्ेर अधिकार’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। 1986 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार और रमन मैगसेसे पुरस्कार प्रदान किया गया। सन् 2006 में महाश्ेवता देवी को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। महाश्ेवता देवी क्रांतिकारी सोच रखने वाली थीं। जीवन के बाद मृत्यु निश्चित है, अंततः 28 जुलाई 2016 को प्रख्यात लेखिका और समाज के दबे कुचले व वंचित वर्गो की पैरोकार महाश्ेवता देवी का 91 वर्ष की आयु में कोलकता में निधन हो गया। महाश्ेवता देवी के निधन से भारतीय साहित्य और बांग्ला साहित्य जगत को अपूर्णीय क्षति हुई उसकी भरपाई होना सम्भव नहीं है।


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