नवरात्र का महत्व

सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में नवरात्र का अपना अलग ही महत्व है। शिव और शक्ति की उपासना भारत मे आदि काल से ही की जाती है। भगवान शिव सूर्य और शक्ति पृथ्वी की प्रतीक है। भारतीय ज्योतिष मे नवरात्रि एक आकाशीय घटना है। कन्या राशि माता दुर्गा की प्रतीक है। और कुंभ राशि महिषासुर का प्रतीक है। नवरात्रि का पर्व दुर्गा जी की उपासना हेतु मनाया जाता है। जो माता पार्वती का ही एक रूप है। नवरात्रि के नौ दिनों में माता पार्वती के ही नौ विभिन्न रूपों का पूजन किया जाता है। नवरात्रि पूजन की अनेक विधियों समाज में प्रचलित हैं। नवरात्रि मे लोेग तंात्रिक और सात्विक तरीको से माता दुर्गा का पूजन करते हैं। तांत्रिक लोग बलि आदि देते है। और सात्विक लोग अपनी सुविधा के अनुसार नौ दिन या पहली व आखिरी नवरात्रि का व्रत करते है और पहले दिन कलश की स्थापना करके नौ दिन तक दुर्गा सप्तशती का पाठ करते है। अष्ठमी को दुर्गा जी का हवन करके नवमी को नौ कुंवारी कन्याओं और एक बालक का लंगूर स्वरूप का पूजन करके उनको भोजन कराते हैं। इनमें पूरी, सब्जी, हलवा या दही, जलेबी की परम्परा है। दुर्गा पूजन की विधि का सविस्तार से वर्णन दुर्गा सप्तशती मे किया गया है। मारकण्डेय पुराण के सात सौ श्लोक ही दुर्गा सप्तशती है।
माँ शैलपुत्री:- नवरात्र के प्रथम दिन देवी मण्डपों में माता शैलपुत्री की पूजा होगी। उमा पार्वती, दुर्गा, अपर्ण, गौरी, महेश्वरी, शिवांगी, शुभांगी और पर्वतवासिनी माँ शैलपुत्री के अनेकोनेक नाम है। पूर्व जन्म में इनके पिता राजा दक्ष थे। पति शिव के मना करने पर भी वह पिता दक्ष के यहाँ यज्ञ में भाग लेने गईं। दक्ष निमंत्रण न भेजकर शिव का पहले ही अपमान कर चुके थे। सती जब पहुँची तो उनका भी तिरस्कार किया। कुपित होकर देवी सती ने यज्ञ कुंड में कूद कर स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया। पार्वती के रूप में दूसरा जन्म शैलराज के यहाँ हुआ। तभी भगवती के प्रथम रूप का नामकरण शैलपुत्री हुआ। घोर तपस्या के बाद शिव से मंगल परिणय हुआ। पार्वती की आराधना के साथ घटस्थापन, अखण्ड ज्योति और देवी के प्रथम चरित्र का पाठ विशेष फलदायी है।
शैलपुत्री की उपासना का मंत्र -
या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण संस्यिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 
माँ ब्रह्मचारिणी:- नवरात्र के दूसरे दिन की आराध्य देवी माँ ब्रह्मचारिणी हें। माता के इस रूप को ब्रह्मलोक की संचालिका माना गया। जब मानस पुत्रों से सृष्टि का विस्तार नहीं हो सका तो माता इस रूप में प्रकट हुईं। स्त्री को इसी कारण सृष्टि का कारक माना गया। अकार, उकार, मकर यानी जन्म, पालन और संहार इसी ब्रह्म तत्व का अंश है। ब्रह्मचारिणी देवी ब्रह्मा जी की आद्य शक्ति हैं। इनको सर्जक कहा गया। माता ब्रह्मचारिणी ध्यान से प्रसन्न होती हैं।
ब्रह्ममचारिणी की उपासना का मंत्र -
या देवि सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण
संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
माँ चन्द्रघण्टा:- नवरात्र के तीसरे दिन माँ दुर्गा, माँ भगवती की तीसरी शक्ति का नाम, तीसरे रूप का नाम ‘चन्द्रघण्टा‘ है। दुष्टों का दमन करने वाली माँ चन्द्रघण्टा के मस्तक पर घंटे का आकार का अर्धचन्द्र है, इसी कारण इन्हें ‘चन्द्रघण्टा’ कहा जाता है। माँ चन्द्रघण्टा देवी की आराधना से साधक सिद्धि पाते हैं। उनकी कृपा से मनुष्य को आलौकिक पदार्थाें का दर्शन होता है पूर्ण ध्यान करने से दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ऐसी वाणी जो मन और कर्ण को शीतलता प्रदान करे, वही वाणी जो संगीत है, यह सरस्वती देवी की आराधना का गुण है। देवी ने असुरों को मायाजाल में फंसाने के लिए ऐसी वाणियाँ युद्ध के दौरान प्रस्फुटित कीं, जिससे सारे असुर दिग्भ्रमित हो गए। घंटे की टंकार सुनकर असुर इधर-उधर भागने लगे, लेकिन उनको पता ही नहीं लगा कि कहाँ से टंकार के स्वर कानों में पड़ रहे हैं? देवी चन्द्रघंटा, पापों और बाधाओं को विनाश करती हैं भय, भूत, प्रेम आदि बाधाओं को शांत करती हैं। नवरात्रि के तीसरे दिन का यह स्वरूप परम शांतिदायक व कल्याणकारी है। इस देवी की कृपा से साधक के सारे पाप और जीवन की बाधाएं नष्ट हो जाती हैं। माँ चन्द्रघण्टा की उपासना से मनुष्य वीरता, निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता भी प्राप्त करता है इनकी पूजा से समस्त सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिल जाती हैं। नवरात्र के तीसरे दिन अर्थात् तृतीया को दूध चढ़ाकर दान करने से सभी प्रकार के दुःखों से मुक्ति मिलती 
माँ कूष्मांडा:- नवरात्र के चैथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा-अर्चना होगी। ईशत हास्य से ब्रह्मांड की रचना करने वाली देवी भगवती कूष्मांडा नाम से लोक प्रसिद्ध हुईं। इनकी कांति और आभा सूर्य के समान है। कूष्मांडा देवी ने ही सृष्टि का विस्तार किया। इनका यह स्वरूप अन्नपूर्णा का है। प्रकृति का दोहन और लोगों को भूख-प्यास से व्याकुल देखकर माँ ने शाकंुभरी का रूप धरा। शाक से धरती को पल्लवित किया और शताक्षी बनकर असुरों का संहार किया। माँ कूष्मांडा देवी उदर की देवी हैं। यह प्रकृति और पर्यावरण की अधिष्ठात्री हैं। माँ कूष्मांडा देवी की आराधना के बिना जप और ध्यान संपूर्ण नहीं होते। नवरात्र के चैथे दिन शाक-सब्जी और अन्न का दान फलदायी है। माता के इस रूप में तृप्ति और तुष्टि दोनों हैं।
माँ कूष्मांडा आराधना का मंत्र है -
या देवि सर्वभूतेषु तृप्ति रूपेण
संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
माँ स्कंदमाता:- देवी भगवती का पांचवा स्वरूप नारी शक्ति और मातृ शक्ति का सजीव चरित्र है। माँ क्या है? माँ क्या है? संतान के प्रति क्यों मोह आसक्त होती है? माँ की परम्परा को अधिष्ठापित करने वाली माता भगवती का नाम स्कंदमाता हे। वह कार्तिकेय और गणेश जी की भी माता हैं। गणेश जी मानस पुत्र हैं और कार्तिकेय जी गर्भ से उत्पन्न। तारकासुर को वरदान था कि वह शंकर जी के शुक्र से उत्पन्न पुत्र द्वारा ही मृत्यु को प्राप्त हो सकता है। इसी कारण देवी पार्वती का शंकर जी से मंगल परिणय हुआ। इससे कार्तिकेय पैदा हुये और तारकासुर का वध हुआ। शंकर-पार्वती के मांगलिक मिलन को सनातन संस्कृति में विवाह परम्परा का प्रारम्भ माना गया। कन्यादान गर्भ धारण इन सभी की उत्पति षिव और पार्वती प्रंसगोपरांत हुई।
माँ स्कंदमाता अराधना का मंत्र -
या देवि सर्वभूतेषु मातृ रूपेण 
संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
कात्यायनी:- नवरात्रि के छठवें स्वरूप के रूप में भगवती कात्यायनी की आराधना की जाती है। छठी आराध्य देवी माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त ही भव्य एवं दिव्य है। इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है। इन भगवती की चार भुजाएं हैं। एक हाथ वर मुद्रा में, दूसरा अभय मुद्रा में, तीसरे हाथ में कमल पुष्प और चैथे हाथ में खड्ग है। माँ कात्यायनी सिंहारूढ़ा है। कात्यायन ऋषि के आश्रम में प्रकट होने के कारण ही यह देवी कात्यायनी कहलाईं। ऋषि का कुल गोत्र भी कात्य था। यूँ पुत्री का गोत्र पति के गोत्र से चलता है, किन्तु देवी ने पिता के गोत्र का प्रतिनिधित्व किया। योग साधना के पीछे कथा है कि कत नामक एक प्रसिद्ध ऋषि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य गोत्र में महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए। ऋषि ने पराम्बा देवी की आराधना करके कामना की कि उनके यहां देवी पुत्री के रूप में जन्म लें। देवी ने यह प्रार्थना स्वीकार ली और उनके यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई भगवती को अजन्मा कहा गया है। सीता जी का जन्म भी धरती की कोख से हुआ। 
माँ कालरात्रि:- नवरात्र के सातवें दिन माँ कालरात्रि की आराधना होगी। भगवान शंकर की शक्ति के रूप में वह कभी रुद्राणी बनकर भक्तों का कल्याण करती हैं, तो कभी चंडिका बनकर चंड-मुड का संहार करती हैं। वह रक्तदंतिका बनकर रक्तबीज का वध करती हैं। देवासुर संग्राम में दैत्यों का सर्वनाश करती हैं। काली जी और शंकर जी का स्वभाव एक सा माना गया है। एक बार गौरवर्णा देवी को शंकर जी ने काली कह दिया, तब से काली नाम से वह लोकप्रसिद्ध हो गईं। वह महामाया के साथ पूजी जायें तो उसका फल दुगना हो जाता है और कामना पूरी होती है। अखंड ज्योति जलाकर काले तिलों से पूजा करने और रात्रि जप-तप करने से माँ काली प्रसन्न होती हैं। सप्तमी की रात्रि यज्ञ करने से साधक के सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं। ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के द्वार खुल जाते हैं।
माँ कालरात्रि उपासना सिद्ध मंत्र -
ऊँ ऐं हीं क्लीं चामुण्डाये विच्चै 
माँ महागौरी
सौभाग्य, धन-संपदा, सौन्दर्य और स्त्री जनित गुणों की अधिश्ठात्री देवी माँ महागौरी हैं। चैत्र नवरात्र व्रत के आठवें दिन साधक देवी के इसी रूप की पूजा करते हैं। अठारह गुणों की प्रतीक माँ महागौरी अष्टांग योग की अधिष्ठात्री भी हैं। वह धन-धान्य, गृहस्थी, सुख और शान्ति प्रदात्री हैं। माँ महागौरी इसी की प्रतीक हैं। भगवान शिव ने काली जी पर गंगाजल डिड़का तो वह महागौरी हो गईं। माँ महागौरी सृष्टि का आधार हैं और अक्षय सुहाग की प्रतीक देवी हैं। देवी के इस रूप की पूजा-अर्चना विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का फल प्रदान करती हैं।
माँ महागौरी पूजा मंत्र -
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे 
सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।
नवम सिद्धिदात्री
देवी भगवती का नौवां स्वरूप सिद्धिदात्री का है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार आठ प्रकार की सिद्धियाँ कही गई है। जिस साधक ने इनको प्राप्त कर लिया वह सुख-समृद्धि का प्रतीक हो गया। अर्थ पाना कठिन नहीं है, अर्थ को सिद्ध करना बड़ा अर्थ रखता है। यह महालक्ष्मी जी का ही स्वरूप है। इनकी आराधना के साथ ही नवरात्र व्रत का पारायण होता है। सिद्धिदात्री देवी पूजन के साथ कन्या भोग और यज्ञ का विशेष फल मिलता है।    
सिद्धिदात्री पूजा का मंत्र -
या देवि सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण
संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः      


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