शाश्वत की खोज

आश्चर्य तो तब होता है, जब यह विदित होता है कि जिन्हें हम शांति का पुंज मानते और जिनमें हमें शांति की तलाश है, वे वास्तव में अशांत हैं और वे इसकी खोज कहीं अन्यत्र कर रहे है। शरीर उनका कुछ कर रहा है, मन कुछ और ढूंढ़ रहा है शरीर कहीं है, मन कहीं और। वे अपने में होते नहीं। उनका संपूर्ण अस्तित्व वहां विद्यमान नहीं होता। इसलिए उनसे भेंट संपूर्ण रूप से होती नहीं। मिलन मात्र शरीर से हो पाता है, जो मन-प्राण के बिना अधूरा है। जो तृप्ति का अन्वेषण वाह्य विश्व में करते रहते हैं, उनकी सत्ता हर वक्त अधूरी बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को थोड़ी भी ठोकर लगती है, तो एकदम असंतुलित होकर गिर पड़ते है और गिरते ही चलते है। गिरने पर या तो आत्महत्या कर लेते हैंया फिर पागल हो जाते है। जो तनिक बुद्धिमान है, वे नाममात्र के विरागी बनकर इधर-उधर भटकने लगते हैं। यही कारण है कि इन दिनों विक्षिप्तों अर्द्धविक्षिप्तों और बैरागी कहे जाने वालों की संख्या द्रुतगति से बढ़ती जा रही है, कारण कि वर्तमान में लोगों की यात्रा भीतर से बाहर की ओर हो गई है, जबकि होना इसके विपरीत चाहिए था।
कभी यही स्थिति भर्तृहरि के समक्ष उपस्थित हुई थी। जब संसार की विषय वासनाओं में उन्हें बार-बार अतृप्ति और अशांति मिली, तो वे समझ गए कि उनकी तलाश गलत दिशा में, गलत ढंग से चल पड़ी है। इसके उपरांत उन्होंने एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम था, ‘शृंगार शतक। इस पुस्तक में उन्होंने बाह्य जगत् में सुखोपलब्धि की व्यर्थता का विस्तार से उल्लेख किया है। इसके पश्चात उनकी अंतर्यात्रा शुरू हुई इसके अनुभवों को उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वैराग्य शतक’ में लिपिबद्ध किया है और बताया है कि स्थिर आनंद की उपलब्धि आंतरिक एवं आत्मिक हैं।