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शाश्वत की खोज

आश्चर्य तो तब होता है, जब यह विदित होता है कि जिन्हें हम शांति का पुंज मानते और जिनमें हमें शांति की तलाश है, वे वास्तव में अशांत हैं और वे इसकी खोज कहीं अन्यत्र कर रहे है। शरीर उनका कुछ कर रहा है, मन कुछ और ढूंढ़ रहा है शरीर कहीं है, मन कहीं और। वे अपने में होते नहीं। उनका संपूर्ण अस्तित्व वहां विद्यमान नहीं होता। इसलिए उनसे भेंट संपूर्ण रूप से होती नहीं। मिलन मात्र शरीर से हो पाता है, जो मन-प्राण के बिना अधूरा है। जो तृप्ति का अन्वेषण वाह्य विश्व में करते रहते हैं, उनकी सत्ता हर वक्त अधूरी बनी रहती हैं। ऐसे लोगों को थोड़ी भी ठोकर लगती है, तो एकदम असंतुलित होकर गिर पड़ते है और गिरते ही चलते है। गिरने पर या तो आत्महत्या कर लेते हैंया फिर पागल हो जाते है। जो तनिक बुद्धिमान है, वे नाममात्र के विरागी बनकर इधर-उधर भटकने लगते हैं। यही कारण है कि इन दिनों विक्षिप्तों अर्द्धविक्षिप्तों और बैरागी कहे जाने वालों की संख्या द्रुतगति से बढ़ती जा रही है, कारण कि वर्तमान में लोगों की यात्रा भीतर से बाहर की ओर हो गई है, जबकि होना इसके विपरीत चाहिए था।
कभी यही स्थिति भर्तृहरि के समक्ष उपस्थित हुई थी। जब संसार की विषय वासनाओं में उन्हें बार-बार अतृप्ति और अशांति मिली, तो वे समझ गए कि उनकी तलाश गलत दिशा में, गलत ढंग से चल पड़ी है। इसके उपरांत उन्होंने एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम था, ‘शृंगार शतक। इस पुस्तक में उन्होंने बाह्य जगत् में सुखोपलब्धि की व्यर्थता का विस्तार से उल्लेख किया है। इसके पश्चात उनकी अंतर्यात्रा शुरू हुई इसके अनुभवों को उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वैराग्य शतक’ में लिपिबद्ध किया है और बताया है कि स्थिर आनंद की उपलब्धि आंतरिक एवं आत्मिक हैं।


 


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पक्षी आपका भाग्य बदले

मनुष्य का जीवन अपने आसपास के वातावरण से ही प्रभावित होता है। व्यक्ति के आस-पास के पशु पक्षी उसके जीवन का अभिन्न अंग है। भारतीय ऋर्षियों तथा संसार के अध्यात्मवादियो ने संसार के पक्षियों को ना केवल ज्योतिष तथा मनुष्य के भाग्य से जोड़ा है। बल्कि पक्षियों को उपयोग शकुन ज्योतिष, फलित तथा प्रष्न ज्योतिष तथा अनेकों ज्योतिष, तांत्रिक उपचारों और शारीरिक मानसिक रोगों के निवारण में किया है। भारत मे पंच प़क्षी शास्त्र, कल्ली पुराण पर आधारित तोते द्वारा भविष्यवाणी, पक्षी तंत्र तथा शकुन ज्योतिष का प्रयोग आदिकाल से ही किया जाता है भारत मे गरूड़ जी, नीलकंठ, काकभुषुंडी,, हंस, जटायु व संपाती, शुकदेव जी आदि दिव्य पक्षियों तथा अनेक देवी देवताआंे वाहन के रूप मे पक्षियों को प्रयोग किये जाने का  वर्णन है। जैसे भगवान विष्णु का गरूड़, कार्तकेय जी का मयूर, माता लक्षमी का उल्लू, विश्वकर्मा, वरूण जी तथा स्वरसती जी का हंस आदि शनिदेव का कौआ आदि का प्राचीन काल मे पक्षियों द्वारा डाक सेवा युद्ध संबधी शकुन का भी काम लिया जाता था पक्षियों को स्वतंत्रता, नवीन विचारों, आनंद, तनाव, मुक्ति, प्रषंसा, यष, धन्यवाद देने, प्रजनन श

परिवर्तन योग से करें भविष्यवाणी

भारतीय ज्योतिशशास्त्र में भविष्यकथन के सैकड़ों सूत्रो का वर्णन है। इन्ही सूत्रों मे से एक है परिवर्तन योग जिसका वर्णन पाराशरीय और नाड़ी ग्रन्थों दोंनों मे पाया जाता है। हाँलाकि दोनो प्रकार के ग्रन्थों में इन सूत्रों को विभिन्न तरीको से प्रयोग किया गया है ज्योतिष मे परिवर्तन योग के तीन रूप पाये जाते हैं। 1. भाव परिवर्तन 2. राशि परिवर्तन 3. नक्षत्र परिवर्तन  भाव परिवर्तन पाराशरीय व कुछ नाड़ी ग्रन्थों जैसे षुक्र नाड़ी मे इसके सूत्रो का वर्णन पाया जाता है। जो भावा के स्वामियो के बीच स्थान परिवर्तन से बनता है। जैसे चतुर्थेश षष्ठ भाव मे जाय और षष्ठेश चतुर्थ भाव मे जाय। इसके भी तीन भेद हैं। 1. दो शुभ भावों के स्वामियों का परस्पर परिवर्तन जैसे लग्न व पंचम भाव का परिवर्तन या दो केन्द्रेशों का परिवर्तन या केन्द्र और त्रिकोण भाव मे परस्पर परिवर्तन। 2. दो त्रिकेशांे का परिवर्तन जो विपरीत राजयोग बनाता है। 3. किसी केन्द्रेश या त्रिकोणेश का त्रिकेश से परिवर्तन। जैसे दशमेश का द्वादेश से परिवर्तन या पंचमेश या द्वादेश के बीच परिवर्तन। 2. ग्रह या राशि परिवर्तन  इसका वर्णन स्व. आर. जी. राव द्वारा अनुवादित और

जेल जाने के योग

ज्योतिष शास्त्र अनुसार कुंडली के आठवें मतांतर से बारहवें भाव से कारावास तथा सजा का विचार किया जाता है। कुंडली के इस घर में राहु अगर अष्टमेश के साथ हो तो उसके अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को किसी बड़े अपराध के कारण जेल जाना पड़ता है। शनि  मंगल और राहू मुख्य रूप से यह तीन ग्रह एवम् इनका आपसी सम्बन्ध जेल के कारक है। शनि व 12 भाव सजा का कारक है। छठा भाव व मंगल राहू अपराध के कारक है। अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में मंगल और राहु एक साथ किसी भाव में बैठकर युति करते हैं तो जेल योग बनता है केतु रस्सी बेड़ी हथकड़ी का कारक ग्रह हैं अशुभ मंगल व राहु के बीच दृष्टि संबंध बनता हो तो अंगारक योग की वजह से ऐसा इंसान हिंसक स्वभाव वाला हो जाता है और अपराध करता है जिससे जेल जाना पड जाता है। शनि मंगल व राहु मुख्य रूप से जेल यात्रा कराने का भी योग बनाते हैं और इनकी युति या आपस में दृष्टि इस तरह की स्थितियां बना देती है कि आखिर इंसान को जेल जाना ही पड जाता है। जन्मकुंडली में सूर्यादि ग्रह समान संख्या में लग्न एवं द्वादश तृतीय एवं एकादश, चतुर्थ, दशम, षष्ठ एवं अष्टम भाव में स्थित हो तो यह बंधन योग बनाता है यह स्थिति