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देशभर के कई प्रसिद्ध साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किये

कैलाश गौतम हिंदी और अवधी के ऐसे निराले कवि हैं कि वे अपने वर्गीकरण को आप चुनौती देते हैं। अगर हम उन्हें प्रेम गीतों का रचनाकार कह कर उनकी ऐसी पंक्तियां याद करें- 
‘आना जी फिर आना/गीत इन्ही गलियों में-तुम पर्व लिए आनाध् त्योहार लिए आना‘। अथवा यह/‘गांव गया था गांव से भागा’ कैलाश गौतम आलोचक के लिए चुनौती हैं कि उन्हें किस वर्ग में रखा जाय। वे रोमांटिक है किंतु यथार्थवाद का आंचल कस कर पकड़े रखते हैं। यह विचार मशहूर साहित्याकार ममता कालिया ने साहित्यिक संस्था गुफ्तगू आॅनलाइन साहित्यिक परिचर्चा में रविवार को व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कैलाश ग्रामीण हैं किंतु शहर की रग-रग समझते हैं। एक जगह वे कहते हैं- ‘जैसे जैसे बेटा बड़ा हो रहा हैध्अपने पांव पर नहींध् बाप के सिर पर खड़ा हो रहा है।’ उनमें समय की विषमता का ज्ञान है किंतु दम्भ या क्रोध नहीं है। कहीं-कहीं दोनों भूमिकाएं साथ निभा देते हैं। गौतम की कविता अमौसा का मेला विश्व स्तरीय कविता है, जिसमे लोक संस्कृति के साथ मीठी खट्टी चुटकियां हैं। कभी उनकी कविता सीधी मार करती है तो कभी तिरछी। एक अकेली कविता ‘झुनिया’ इसे समझने के लिए पर्याप्त है। नागार्जुन की तरह कैलाश गौतम भी जनकवि हैं। उनसे हम सब को उम्मीदें थीं जो उनके असमय निधन से अचानक टूट गईं। गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज अहमद गाजी ने कहा कि कैलाश गौतम न सिर्फ बड़े कवि थे बल्कि वे आम लोगों के बड़े मददगार भी थी, मुसीबत के समय हर किसी के साथ खड़े हो जाते थे। उनकी कविताएं रिक्शा, टाली वालों तक को याद हैं, वे वास्तव में जनकवि हैं। मुरादाबाद के मशहूर गीतकार माहेश्वर तिवारी ने कहा कि कैलाश गौतम हास्य-व्यंग्य के न केवल बड़े कवि थे बल्कि हिंदी गीत के भी एक महत्वपूर्ण रचनाकार थे साथ ही वे एक सिद्ध कथाकार भी थे। उनकी रचनाओं में लोक निरंतर उपस्थित रहता है। पप्पू की दुलहिन उनकी एक अन्य अत्यन्त लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य रचना है। मंच से इतर तो उनका एक अलग साहित्यिक व्यक्तित्व था। दिल्ली के मशहूर साहित्यकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा कि कैलाश जी कविताओं में ग्रामीण भारत जितने व्यापक रूप में आया है उतना बहुत कम कवियों की कविताओं में मिलेगा। यहां ग्रामीण जीवन की बहुरंगी छवियां तो हैं ही, उस व्यवस्था की भी गहरी पड़ताल और वेदना है जो आजादी के बाद भी नहीं बदल सकी। यश मालवीय ने कहा कि कैलाश जी मुझे हमेशा कविता के किसान जैसे ही लगे हैं। उनकी कविताएँ एक किसान कवि की ही कविताएं हैं, जिसमें लोकमन बोलता है।



इलाहाबाद और बनारस जैसे शहर उनकी कविताओं में सांस लेते हैं। विवेकीराय के शब्दों में मैं सहज ही कल्पना करता हूं कि अगर आज मुंशी प्रेमचंद कविताएं लिख रहे होते तो उनकी कविताओं का स्वर कुछ कुछ कैलाश जैसा ही होता। नोएडा के मशहूर शायर कवि विज्ञान व्रत ने कहा कि कैलाश गौतम अपनी कविताओं में अपने समय का प्रतिनिधित्व सम्पूर्ण गाम्भीर्य के साथ करते थे। उनके काव्य की भाषा और कहन में उनका नितान्त अपना मुहावरा परिलक्षित होता था। उधमसिंह नगर की कवयित्री शगुफ्ता रहमान ने उन्हें विद्वान और दूरदर्शी बताया, कहा कि ’पप्पू की दुल्हन’ में उन्होंने आधुनिक नारी के गरिमामय एवं उन समस्त सद्गुणों की कमी को परिलक्षित किया है। मनमोहन सिंह ‘तन्हा’, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, शैलेंद्र जय, नीना मोहन श्रीवास्वत, सागर होशियापुरी, जमादार धीरज, प्रभाशंकर शर्मा, संजय सक्सेना, ऋतंधरा मिश्रा, शिवाशंकर पांडेय, फरमूद इलाहाबादी, अतिया नूर, ममता देवी, रमोला रूथ लाल आदि ने उनकी कविताओं पर विचार व्यक्त किए। सोमवार को ऋतंधरा मिश्रा के काव्य संग्रह ‘आखिर मैं हूं कौन’ पर परिचर्चा होगी।


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