प्रभाशंकर की कविताओं में स्पष्ट यथार्थ के दर्शन: शगुफ्ता

विभिन्न प्रतिभाओं के धनी आदरणीय प्रभा शंकर शर्मा की रचनाओं में आशावाद के साथ-साथ जीवन के यथार्थ के स्पष्ट दर्शन होते हैं। सामाजिक मुद्दों के साथ राष्ट्रीय मुद्दों को अपनी रचनाओं में शामिल करना एक संवेदनशील साहित्यकार को स्वयं में दूसरे साहित्यकार से अलग स्थापित करता है। मां के प्रति समर्पण एवं मां की छत्रछाया में संतानों का सुरक्षित महसूस करना इस का सजीव चित्रण मार्मिक है। कवि द्वारा स्पष्ट किया गया है कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए दृढ़ निश्चय होना अति आवश्यक है। यह विचार उधमसिंह नगर की कवयित्री शगुफ्ता रहमान ने शुक्रवार को गुफ्तगू द्वारा आयोजित ऑनलाइन साहित्यिक परिचर्चा में प्रभाशंकर शर्मा की कविताओं
पर व्यक्त किया।
भुवनेश्वर के वरिष्ठ कवि शैलेंद्र कपिल ने कहा कि प्रभाकर शर्मा की रचनाओं में हिंदी व उर्दू साहित्य से समृद्ध होने की झलक मिलती है, वे गजल लेखन में भी दखल रखते हैं। परिदृश्य शीर्षक की कविता रंगमंच की याद दिलाता है, काव्य का परिचायक होता प्रतीत होता है। हास्य व्यग्ंय की कविताएं प्रभाकर की विषयवस्तु को विस्तार प्रदान करती हैं। नरेश महारानी ने कहा कि कवि प्रभाशंकर चेहरे पर मुस्कान बेहद शांत, और, शालीन व्यक्तिव के स्वामी हैं। उन्होंने शिक्षा और कवि दोनों रुप से शिक्षाप्रद और राह दिखाने का कार्य किया है। उनकी रचनाएं विविधताओं का संगम है। उन्होंने मानव जीवन के सभी पहलुओं को छूते हुए संजीदगी से चित्रण किया है। डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ ने कहा कि जीवन के विविध पक्षों को उद्घाटित करतीं सुकवि प्रभाशंकर शर्मा की कविताएं मानस पटल पर अपनी छाप छोड़ती हैं। इन कविताओं में गहन भाव के पक्के धागे में आशावाद के सुन्दर मनके पिरोये गये हैं। संवेदना की प्रभावी सतह और लयात्मकता कथ्य को हृदय से जोड़ देती है। यही रचनाकार की सफलता है। ऋतंधरा मिश्रा के मुताबिक प्रभाशंकर शर्मा की रचनाएं बहुत ही संवेदनशीलयथार्थ के धरातल पर व्यक्ति के जीवन दर्शन को दर्शाती हैं तथा आज के परिवेश से असंतुष्ट रचनाकार कहीं न कहीं अपनी वास्तविकता को तलाश रहा है। जो उससे सुकून देती हैं बनावती जीवन से त्रस्त शांति की तलाश में अपने खोए हुए संस्कार अपने मौलिक स्वरूप को तलाश रहा है जहां से शांति दिख रही है । इनके अलावा मनमोहन सिंह ‘तन्हा’,  जमादार धीरज, सम्पदा मिश्रा, संजय सक्सेना, डॉ. ममता सरूनाथ, विजय प्रताप सिंह, शैलेंद्र जय, रचना सक्सेना, रमोला रूथ लाल ‘आरजू’, तामेश्वर शुक्ल ‘तारक’, अनिल मानव, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम’ और अर्चना जायसवाल ने भी विचार व्यक्त किए। संयोजन गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। शनिवार को रमोला रूथ लाल ‘आरजू’ के काव्य संग्रह ‘यह दर्द ही तो बस अपना
है’ पर परिचर्चा होगी