प्रभु की शिक्षाओं को जानना ही प्रभु को जानना है

(1) मैं कौन हूं? मोक्ष क्या है? क्या मोक्ष इसी जीवन में संभव है?:-  
 इंसान अनादि काल से जगत की उत्पत्ति और प्रलय के रहस्यों को खोलने में लगा है। वह जानना चाहता है कि यह प्रकृति कैसे कार्य करती है? जीवों के जन्म-मरण का रहस्य क्या है? जगत के इन दैवीय रहस्यों को जानने के लिए मनुष्य जप, तप, खोज, ध्यान, मनन, चिंतन, तीर्थाटन, सत्संग आदि-आदि के मार्ग अपनाता है। आज मानव जाति अनेक समस्याओं, कुरीतियों तथा मूढ़ मान्यताओं से पीड़ित तथा घिरी हुई है। मनुष्य परमात्मा के दर्शन भौतिक आंखों से करना चाहता है। अध्यात्म अनुभव का क्षेत्र है और इसकी प्रक्रियाओं व वैज्ञानिक प्रयोगों को प्रत्यक्ष दिखाया नहीं जा सकता, जैसे- हम वायु को देख नहीं सकते, केवल अनुभव कर सकते हैं, ठीक उसी तरह अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोग स्थूलजगत में देखे नहीं जा सकते, केवल उनके परिणामों को देखा जा सकता है।
(2) पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है जहां पदार्थ तथा चेतना दोनों तत्व हैं:- 
 इस सृष्टि में पदार्थ और चेतना दोनों साथ-साथ मिलकर कार्य करते हैं। जैसे हमारे शरीर में जब तक जीवात्मा है तब तक प्रकृति के पंचतत्वों भूमि, आकाश, वायु, अग्नि तथा जल से बना यह शरीर जीवित है। जीवात्मा के शरीर से पृथक होते ही पंचतत्वों से बना यह शरीर निर्जीव व निष्क्रिय हो जाता है। अब तक ब्रह्माण्ड में ज्ञात ग्रहों में पृथ्वी ही ऐसा अनूठा तथा जीवित ग्रह है जहां पदार्थ तथा चेतना दोनों तत्व हैं।  
(3) विज्ञान भौतिक जगत का एवं अध्यात्म चेतना जगत का प्रतिनिधि है:-  
 आज के वर्तमान समय में विज्ञान जहाँ भौतिक जगत का प्रतिनिधित्व कर रहा है, वहीं अध्यात्म चेतना जगत का 
प्रतिनिधित्व कर रहा है। विज्ञान वह है, जो इंद्रियों के द्वारा जाना-समझा जाता है; जबकि अध्यात्म विश्वास, समर्पण व आत्मानुभूति द्वारा जाना जाता है। इसे वास्तव में चेतना का विज्ञान कह सकते हैं और इस चेतना का जितना विकास होगा, हमारी प्रकाशित बुद्धि व विवेक उसी मात्रा में जाग्रत होती जायेगी। परमात्मा का अनुभव कहने की बात नहीं है, बस, प्रतिक्षण उसे जिया ही जा सकता है। परमात्मा का अनुभव तो अतिव्यापक और परम विराट है। जिन्होंने ईश्वर के अनुभव को जाना, उन्होंने अपने निष्कर्ष में बस इतना ही कहा कि जो मैंने अनुभव करके जाना, उसे तुम भी अनुभव करके जान सकते हो। अर्थात प्रतिदिन, प्रतिक्षण तथा प्रत्येक कार्य में ईश्वर को जानना तथा उससे प्रेम करना ही मेरे जीवन का परम उद्देश्य होना चाहिए।
(4) संसार के प्रथम स्त्री-पुरूष को उत्पन्न करने वाला स्वयं परम पिता परमात्मा है:-
 परमात्मा ने सर्वप्रथम सृष्टि की रचना की। उसके बाद परमात्मा ने सोचा कि मेरे सृष्टि रूपी आंगन में बच्चे खेलंेगे तो यह दृश्य कितना सुन्दर होगा। संसार के प्रथम स्त्री-पुरूष यानी एडम एवं ईव या मनु और सतरूपा के माता तथा पिता दोनों को उत्पन्न करने वाला स्वयं परम पिता परमात्मा है। परमात्मा ने प्रथम स्त्री-पुरूष को विवाह करके व परिवार बसाकर ही संसार में एक साथ भेजा। उसी समय परमात्मा ने उनके धर्म यानी उनके कर्तव्य निर्धारित करके कहा कि तुम दोनों एकता और प्रेम के साथ मेरी सृष्टि में रहते हुए अपने बच्चों को भी एकता और प्रेम से रहने की शिक्षा देना। यह सिलसिला आगे भी अनन्त काल तक ऐसे ही चलता रहे। परमात्मा द्वारा स्थापित एकता तथा प्रेम का धर्म शाश्वत तथा अपरिवर्तनीय है। संसार के हर पिता की इच्छा होती है कि मेरे बच्चे एकता तथा प्रेम से हिलमिलकर रहे। इंसान का धर्म एकता तथा प्रेम है उसी के विपरीत शैतान का धर्म अनेकता तथा नफरत है।  
(5) परमात्मा सृष्टि की रचना के पहले भी था तथा बाद में भी रहेगा:-  
 परमपिता परमात्मा तो सृष्टि में सर्वत्र अर्थात सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। वैसे तो उसका कोई नाम नहीं है लेकिन हम उसे अपनी-अपनी भाषा की सुविधानुसार परमात्मा, प्रभु, ईश्वर, भगवान, खुदा, अल्ला, गाॅड, वाहेगुरू आदि नामों से पुकारते हैं। इस सृष्टि के बनने के पहले भी वह था और इस सृष्टि के बाद भी वह रहेगा। धरती के अंदर अनाज, खट्टे-मीठे फल, खनिज पदार्थ तथा सभी भौतिक चीजें परमात्मा ने इंसान के लिए भर दी हैं। परमात्मा कहता है कि हे आत्मा के पुत्र! यह सारी सृष्टि एवं इस सृष्टि की समस्त वस्तुएं तुम्हारे लिए बनायी हैं। बस तुम्हारा पवित्र हृदय मैंने अपने रहने के लिए बनाया है। तुम अपने हदय को जीवन पर्यन्त पवित्र ही बनाये रखना तथा उसे स्वार्थ रूपी बुराई से भरकर गंदा मत करना। परमात्मा द्वारा स्वयं सृजित प्रथम स्त्री-पुरूष की फेमिली पिछले अनगिनत वर्षो में बढ़ते-बढ़ते आज सात अरब से अधिक जनसंख्या तक पहुँच गयी है। परमात्मा की आज्ञाकारी संतान होने के नाते हमें देखना है कि संसार में हमारे परिवार के सात अरब से अधिक लोग हिलमिल कर रहें।  
(6) इस पृथ्वी पर मैं किस महान उद्देश्य के लिए आया हूं?:- 
 हम परमात्मा को देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते, उसको छू नहीं सकते तथा उससे बात नहीं कर सकते। तो फिर प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि हम प्रभु को जाने कैसे? हम अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचाने कैसे? प्रभु को जानने तथा उसकी पूजा करने का वर्णन बहाई धर्म की एक सुन्दर प्रार्थना में किया गया है जो इस प्रकार है- ‘‘हे मेरे परमात्मा मैं साक्षी देता हूँ कि तूने मुझे इसलिए उत्पन्न किया है कि मैं तूझे जाँनू और तेरी भक्ति करूँ।’’ इस प्रकार प्रभु ने हमें केवल दो कार्यों (पहला) ‘परमात्मा को जानने’ और (दूसरा) उसकी ‘भक्ति’ करने के लिए ही इस पृथ्वी पर मनुष्य रूप में उत्पन्न किया है।
(7) सभी पवित्र पुस्तकों की शिक्षायंे सीधे परमात्मा की ओर से आयी हैं:-  
 पहला- प्रभु को जानने का मतलब है कि परमात्मा द्वारा युग-युग में मानव जाति की भलाई के लिए अपने संदेशवाहकों के माध्यम से जो ज्ञान धरती पर भेजा गया उन्हें त्रुटिरहित पवित्र पुस्तकों में संकलित कर लिया गया। कालान्तर में ये संकलित शिक्षायें संसार की विभिन्न भाषाओं में अनुवादित होकर समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए युग-युग के लिए सहज उपलब्ध हो गयी। मानव जाति का कर्तव्य अर्थात धर्म है कि सर्वप्रथम पवित्र पुस्तकों की शिक्षाओं जैसे - कृष्ण के मुँह से निकली पवित्र गीता में प्रकटित न्याय की शिक्षा, बुद्ध के चिन्तन में अवतरित त्रिपटक में प्रकटित समता की शिक्षा, ईशु पर अवतरित बाईबिल में प्रकटित करूणा की शिक्षा, मोहम्मद साहब पर नाजिल कुरान में प्रकटित भाईचारा की शिक्षा, नानक द्वारा गुरू ग्रन्थ साहेब में प्रकटित त्याग की शिक्षा व बहाउल्लाह द्वारा किताबे अकदस में प्रकटित हृदय की एकता आदि शिक्षाओं के सार को उनकी गहराई में जाकर जानना चाहिए। इन सभी पवित्र पुस्तकों की शिक्षायंे सीधे परमात्मा की ओर से आयी हैं इसलिए ये शिक्षायें केवल किसी एक धर्म जाति के लिए ही नहीं वरन् सारी मानव जाति के लिए हैं। 
(8) सृष्टि से समभाव प्रदर्शित करने का एकमात्र माध्यम मानव मात्र की सेवा है:- 
 दूसरा- परमात्मा की पूजा (भक्ति) करने का मतलब है कि परमात्मा की शिक्षाओं के अनुरूप पवित्र भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय करके अपनी प्रभु भक्ति को सर्वोच्च स्तर तक बढ़ाना। प्रभु भक्ति से ओतप्रोत होकर जब भक्त अपने प्रत्येक कार्य के फल को अहंकाररहित होकर ईश्वर को समर्पित करता है तब वह ईश्वर का सबसे श्रेष्ठ तथा प्रिय भक्त बन जाता है। प्रभु भक्ति में एक ऐसी सर्वोच्च अवस्था आती है, जब भक्त के मन से अपने पराये का भेद मिट जाता है उसे लोक कार्य के सिवा कुछ भी रूचिकर नहीं लगता। प्रभु भक्त ईश्वर की समूची सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को समभाव से प्यार करने लगता है। सृष्टि से समभाव प्रदर्शित करने का एकमात्र माध्यम मानव मात्र की सेवा है।  
(9) हमारे प्रत्येक कार्य ही परमात्मा की सुन्दर प्रार्थना बने:-
 व्यक्ति का अपने प्रत्येक कार्य से कर्ताभाव विलीन होने से उसके प्रत्येक कार्य ही ईश्वर की सुन्दर प्रार्थना बन जाते हैं। कार्य के प्रति आस्था कम होना आज की सबसे बड़ी समस्या है जबकि सर्वोच्च सफलता का यह निर्णायक तत्व है। कार्य पर आस्था ईश्वर पर प्रबल आस्था तथा प्रबल विश्वास की तरह है। यह न केवल हमारे कार्य को आध्यात्मिक संतुष्टि तथा आनंद से भरती है बल्कि एक व्यक्ति के तौर पर भी हमको आनंदपूर्ण, सुखी तथा सफल बनाती है। यह मानव जाति की सबसे बड़ी त्रासदी है कि वे अपने अंदर के संगीत को बिना लोक कल्याण के लिए अभिव्यक्त किए बिना ही इस संसार से चले जाते हंै।       
(10) प्रभु के सभी संदेशवाहक दैवीय रहस्य होते हैं:- 
 प्रभु के संदेशवाहक दैवीय रहस्य होते हैं। परमात्मा इन्हें मानव जाति का मार्गदर्शन अपने संदेश द्वारा करने के लिए विशेष रूप से सृजित करता है। संदेशवाहकों के अंदर परमात्मा की शिक्षाओं को मानव जाति तक पहुंचाने के अलावा अन्य सांसारिक मोह-माया के विचार तनिक भी नहीं रहते हैं। सभी संदेशवाहकों को परमात्मा अपना संदेश संसार में पहुंचाने के लिए मानव कल्पना से परे अति कठोर कष्टों को सहन करने की शक्ति भी प्रदान करता है। प्रभु अपने संदेशवाहकों को कठोर कष्ट तथा कठोर हृदयों को पिघला देने वाली पीड़ा इसलिए देता है ताकि मानव जाति का ध्यान संदेशवाहकों द्वारा लाये गयी प्रभु की शिक्षाओं की ओर आकर्षित हो और उनका दृढ़ता के साथ पालन करें। प्रभु की राह पर चलने वाले मनुष्य में भी बड़े से बड़ा कष्ट सहने करने की अपार शक्ति आ जाती है।
(11) प्रभु के सभी संदेशवाहक परमात्मा तथा मनुष्य के बीच ब्रिज की भूमिका निभाते हैं:-    
 संदेशवाहक भगवान नहीं होते लेकिन हम इन्हें भगवान इसलिए कहते हैं क्योंकि यह परमात्मा द्वारा अपने संदेश को मानव जाति में भेजने के लिए विशेष रूप से सृजित किया जाता है। प्रभु के इन संदेशवाहकों की आत्मा अत्यन्त पवित्र होती हंै, इसलिए संसार का कोई भी मनुष्य इनसे अपनी तुलना नहीं कर सकता। यद्यपि इनका साधारण मनुष्य की तरह जन्म भी होता है तथा इनकी मृत्यु भी होती है। जबकि परमात्मा अजन्मा है। अर्थात परमात्मा का न तो जन्म होता है और न ही उसकी मृत्यु होती है। प्रभु के संदेशवाहकों को देखकर कोई भी इन्हें पहचान नहीं सकता कि ये ईश्वर के संदेशवाहक हैं। अक्सर ईश्वर के संदेशवाहकों को इनकी जीवित अवस्था में रहते हुए कोई भी पहचान नहीं पाता। संसार के लोग इन्हें साधारण मनुष्य ही समझते हंै। संसार के बिरले ही पहचान पाते हैं कि ये साधारण पुरूषों से अलग हैं तथा विलक्षण आध्यात्मिक शक्ति से ओतप्रोत हैं। 
(12) राम ने सारी मानवजाति को ‘मर्यादा’ का तो कृष्ण ने दिया ‘न्याय’ की स्थापना का संदेश दिया:- 
 अब तक ज्ञात मानव सभ्यता के अनुसार लगभग 7,500 वर्ष पूर्व के युग के प्रभु के संदेशवाहक मर्यादापुरूषोत्तम भगवान राम को राज्याभिषेक होने के ठीक एक दिन पहले 14 वर्ष का वनवास दे दिया गया। उनकी पत्नी सीता को दुष्ट रावण धोखे से उठा ले गया। राम ने अपने जीवन द्वारा व्यापक रूप से सारी मानवजाति को मर्यादा की शिक्षा दी। लगभग 5000 वर्ष पूर्व के युग के प्रभु के संदेशवाहक योगेश्वर कृष्ण के पैदा होने के पूर्व ही उनके माता-पिता को जेल में डाल दिया गया था। कृष्ण के सात भाइयों को उनके जन्म लेने के पूर्व सगे मामा कंस के द्वारा पटक-पटक कर मार दिया गया। कृष्ण ने कंस तथा कौरवों के अन्याय को खत्म करके न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की। इस प्रकार अपने युग की समस्या के समाधान के लिए कृष्ण को न्याय आधारित समाज की स्थापना के लिए अनेक कठोर कष्ट सहने पड़े।