मैं छोड़ कर गली को तेरी आ गया मगर

बोझल किया है हिज्र की रातों ने उम्र भर
बिस्मिल किया है वस्ल के नगमों ने उम्र भर


वो कैसे चाहे और निगाहों में जा रहूँ
चाहा है जिसको मेरी निगाहों ने उम्र भर


मरने के थे कगार पे क्या भूल तुम गए
जिंदा रखा है तुमको दुआओं ने उम्र भर


मैं छोड़ कर गली को तेरी आ गया मगर
पीछा किया है तेरी वफाओं ने उम्र भर


बेनाम को ये नफरतें तो छू न पाएंगी
बाँधा है उसको प्यार के धागों ने उम्र भर