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खिला फूल गुलाब

शाश्वत सांस्कृतिक साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था प्रयागराज के तत्वावधान में संस्था की महासचिव ऋतन्धरा मिश्रा के संयोजन में पुस्तक परिचर्चा संबधित एक आयोजन का प्रारम्भ किया गया जिसमें वरिष्ठ रंगकर्मी रंग निर्देशिका सुषमा शर्मा की बाल नाटक पुस्तक ‘खिला फूल गुलाब का’ पर  पुस्तक परिचर्चा चली जिसमें अनेक वरिष्ठ रंगकर्मी साहित्यकार नाट्य लेखक ने उनके बाल नाटक संग्रह पर अपने विचार रखें नाट्य लेखक अजीत पुष्कल जी ‘खिला फूल गुलाब’ का एवं अन्य बाल नाटक सुषमा शर्मा के द्वारा लिखे गए बच्चों के नाटक है। मेरे विचार से यह नाटक प्रस्तुति की दृष्टि से इस कमी को पूरा करेंगे, लेखिका का रंगमंच के अनुभव नाटकों को नाटक दूसरे निर्देशकों के लिए बेहद सहायक साबित होंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। इन नाटकों के विषय विविधता लिए हुए है ‘लारा की टोपी’ ऐसा नाटक है जिसमें लारा के जन्मदिन पर उसकी मां एक टोपी बुनकर उसे देती है और उस टोपी पर हर किसी की नजर लगी रहती है, किंतु लारा मां के प्यार को समझते हुए टोपी को बचाकर बड़े यतन से बचा कर घर ले आता है। और बाल मनोविज्ञान के साथ एक नैतिकता का बोध एवं मां के प्रति प्यार इस नाटक में है। अन्य नाटकों का विषय भी आधुनिक है ‘खिला फूल गुलाब’ का चाचा नेहरू के बचपन से जुड़ी रोचक घटनाओं पर आधारित है। ‘बोल मारी मछली कितणो पानी’ नाटक से हम खेल-खेल में विश्व में बढ़ती पानी की समस्या से जुड़ जाते हैं। ‘लोमड़ी की दुम’ नाटक जीव संरक्षण एवं पर्यावरण से जुड़ा नाटक है इसमें सभी नाटक उपदेश परक हैं और निश्चय ही बाल रंगमंच के लिए उपलब्धि है।
डॉ अनुपम आनंद आज हम कठिन समय से गुजर रहे हैं। इसमे कलाएं हमारी मदद कर सकती हैं। रंगकर्म मानवीय उपस्थिति से ही सम्भव है। इसे बचाना है तो हमें नई पीढ़ी को शिक्षित करना होगा वरिष्ठ रंगकर्मी अभिलाष नारायण चतुर चोर पढ़ा, बच्चों के लिए अच्छा प्रयास है सुषमा जी के अंदर लेखन की क्षमता है और हम उनसे एक फुल लेंथ नाटक की  अपेक्षा कर सकते हैं. वर्षों का निर्देशकीय अनुभव, तथा विरासत में मिली लेखन क्षमता का अद्भुत संगम होगा वो नाटक। 
नाट्य लेखक अख्तर अली का विचार है बाल रंगमंच ही भविष्य का रंगमंच होता है। 
रंगमंच में मौजूद बहुत सी समस्याओं में से कुछ एक समस्याओं से बचा जा सकता था यदि हमने बाल रंगमंच पर उचित ध्यान दिया होता द्य सुषमा जी ने बाल रंगमंच पर जो काम किया है वह सराहनीय ही नही वंदनीय भी है द्यबाल रंगमंच में पुरूष की बजाय महिला का होना ज्यादा उपयोगी है, क्योकि पुरूष स्वभाव से कठोर होता है और महिला ममतामयी होती है, अतरू बच्चो में रंग संस्कार पुरूषो की अपेक्षा महिला के द्वारा ज्यादा प्रभावशाली ढ़ंग से संप्रेषित किया जा सकता है। मैने सुषमा जी का नाटक चतुर चोर और तीन मित्र पढ़ा द्य पहले पाठक की दृष्टि से पढ़ा फिर समीक्षक की दृष्टि से पढ़ा द्य दोनो दृष्टि एक जैसा परिणाम नही दे सकी। बच्चो का साहित्य रचना बच्चो का खेल नही है द्य नाटक पढ़ कर यह बात एकदम साफ हो जाती है कि इसे किसी अनुभवी और प्रशिक्षित रंगकर्मी ने लिखा है, क्योकि पूरे नाटक में कही भी मंच की तकनीक छूटती नही है द्य नाटक पूरी तरह मंच की भाषा में है यानि लयात्मक है और भाषा मे दृश्य समाहित है द्य अब क्या होगा...... इसकी उत्सुकता बनाये रखना भी इसकी विशेषता का हिस्सा है द्यनाटय लेखन में कथ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका शिल्प होता है क्योकि नाटक कथ्य के सहारे नही बल्कि अपने शिल्प के सहारे चलता है। नाटक में राज दरबार, जंगल, पर्वत, मार्ग के आर्कषक दृश्य मंच पर दिखाये जा सकते है। नाटक में एक पात्र तोता भी है ,मंच पर अभिनेता को बड़े से पिंजरे में तोता बनाकर खड़ा कर निर्देशक नाटक के ट्रीटमेंट में अभिनव प्रयोग भी कर सकता है मंच सज्जा, रूप-सज्जा और वेशभूषा की भरपूर संभावनाएं लेखिका सुषमा जी ने निर्मित की है। 
नाटक का एक अहम पक्ष इसके गीत है। कथानक को आगे गीतो के जरिये बढ़ाना सुषमा जी की रंगमंच की समझ को दर्शाता है। सभी गीत नाटय संगीत के अनुसार रचे गये है।
समीक्षक की दृष्टि से जब नाटक पढ़ा तो एक बात जरा खटकी की इसमें यू टर्न लाने के लिये चोर का सहारा क्यो लिया गया? हम अपने बच्चो को चोर से क्यो परिचित कराये और वरंगकर्मी मीना उराव सुषमा शर्मा द्वारा लिखित खिला फूल गुलाब का एक नाटक 3 मित्र और कालू चोर का मैंने उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन बाल नाट्य कार्यशाला में प्रस्तुति के रूप में चयन किया था।
वरिष्ठ रंगकर्मी रोजी दुबे का कहना है लेखिका सुषमा शर्मा जी का हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ कि उन्होंने इतनी सुन्दर बालनाट्य की रचना की।
लारा की टोपी-
बच्चों की दुनिया बहुत ही काल्पनिक और मासूम होती हैं। 
उन की कल्पना वास्तविक दुनिया से परे उन सब चीजों को हासिल करना है जो कहानियों में सुनते आये है।
लारा एक ऐसा बच्चा जिसका जीवन  अभाव में बीत रहा है उस की माँ लारा के जन्मदिन पर तोहफे में अपने हाथों से बनी टोपी भेंट करती हैं। 
वह टोपी वहां की राजकुमारी को पसंद आ जाती हैं। राजकुमारी टोपी के बदले धन-धान,सोना-चाँदी कुछ भी देने को तैयार रहती हैं पर लारा टोपी देने से इनकार कर देता है क्योंकि वह उस के लिए अनमोल हैं जिस में उस की माँ का प्यार है जो लारा के लिए बेशकीमती है। जिस से वह किसी को देना तो दूर बाँट भी नहीं सकता।  
बच्चे का अपनी माँ के लिए मासूम प्यार रिश्तों की डोर को मजबूत बनाता है ।जो शिक्षा भी देता है कि माँ-बच्चे का प्रेम निस्वार्थ होता है जिसे किसी लालच से तोड़ा नहीं जा सकता।
शिक्षाप्रद आलेख। 
बहुत- बहुत साधुवाद सुषमा जी
वरिष्ठ रंगकर्मी अजय केसरी सबसे पहले मैं सुषमा शर्मा जी को बच्चों के नाटक ‘खिलाफ फूल गुलाब का’ के लिए उनको बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
वरिष्ठ रंगकर्मी रंग निर्देशिका ऋतंधरा मिश्रा सुषमा शर्मा जी एक प्रतिभाशाली लेखिका हैं जिन्हें नाट्य लेखन विधा में महारत हासिल है। इनकी बाल नाटक पुस्तक ‘खिला फूल गुलाब का’ मे सात बाल नाटक है  ‘लोमड़ी की दुम’ ‘बोल मेरी मछली कितणो पानी’ ‘दीक्षा’  ‘चतुर चोर और तीन मित्र’  ‘ऊंचे कुल क्या जनमियाँ’ ‘खिला फूल गुलाब का’ कौतूहल और पठनीयता पर खरी उतरती हैं। भावात्मक और रचनात्मक स्तर पर भी प्रभावित करती हैं। जल संरक्षण पर्यावरण विषय पर सीख देता रोचकता से परिपूर्ण है सभी नाटक उपदेश परक है जो पाठक की चेतना पर प्रभाव छोड़ती हैं। लेखिका प्रयोगधर्मी है। इनके नाटक के कथ्यों में विविधता है। नाटक संग्रह में पौराणिक कथाएँ भी हैं।   
वरिष्ठ रंगकर्मी मीना उरांव कहती हैं सुषमा शर्मा द्वारा लिखित खिला फूल गुलाब का बाल रंगमंच के लिए उपयोगी है।
नाटक के संवाद छोटे-छोटे  है  बीच-बीच में नाटककार ने छोटे-छोटे गीत भी रखे हैं जिसमें गणेश वंदना यह गीत नौटंकी के छंद बहरे तमिल में थी और कुछ गीत फिल्मी धुनों पर आधारित है जिसको गाकर बच्चे बहुत खुश होते थे कलाकारों द्वारा ही विभिन्न कंपोजिशंस बनाए गए कभी नदी कभी पहाड़ तो कभी जेल तो कभी जेल बच्चों का नाटक था इसलिए प्रॉप्स बहुत हल्की रखी गई इस कला इस नाटक को बच्चों ने बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया खासतौर से तोते की भूमिका और मुखिया की भूमिका को बाल दर्शकों द्वारा बहुत प्रशंसा मिली।
युवा रंगकर्मी मनीष तिवारी खिला फूल गुलाब का एक बेहतरीन बाल्य नाट्य आलेख है। आज के समय मे इस प्रकार के लेखन की बहुत कमी है ये नाटक कार्यशाला के उपरांत लिखी गयी हैं वैसे तो ये बाल्य नाट्य है पर इसकी कहानियाँ वर्तमान की परिस्थितियों को बयां करती हैं जैसे, पानी, पर्यावरण, भाईचारा इत्यादी। शायद लेखिका की ये कल्पना होगी की इन विषयों को बालक के मन मे बीजारोपण किया जाय ताकी हमारा कल बेहतर हो।
पुस्तक समीक्षा की वरिष्ठ रंगकर्मी रंग निर्देशिका सुषमा शर्मा ने आभार व्यक्त किया। पुस्तक की समीक्षा संपन्न हुई।


 


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