पूर्वजन्म केस का ज्योतिषीय विवेेचन

पूर्वजन्म की यह कुंडली अमृतसर के विद्वान और वरिष्ठ ज्योतिषी श्री कीर्ति ग्रोवर जी ने अपने फेस बुक एकांउट मंे 25 एवं 26 अगस्त 2018 मे प्रस्तुत की थी उनके अनुसार सन् 2004 मे समाचार पत्रों मे आकाश नामक बालक के पुर्नजन्म की खबर पढकर मि. ग्रोवर अपनी टीम के साथ बरेली जिले के तेहबेहरी कस्बे के पिपरिया गांव गये उन्होंने आकाश से मुलाकात करके पुर्नजन्म के तथ्यों की जांच करके आवश्यक ज्योतिषीय आकड़े प्राप्त किये तथ्यों के अनुसार बरेली जिले के पिपरिया गांव मे 19 मार्च सन् 2000 को प्रातः 7 बजे एक बालक का जन्म हुआ जिसका सिर जन्म से ही एक साईड पर उभरा हुआ था आकाश जब कुछ बड़ा हुआ तो कहने लगा कि वो आकाश नही छोटेलाल है वह दूसरे गांव मे रहता है। और गत जन्म मे ट्रक के नीचे आकर वह मर गया था गत जन्म मे उसकी पत्नी और बच्चे थे बात तूल पकड़ने पर उसके परिजन उसे उसके गत जन्म के गांव ले गये जहां ना केवल अपनी पत्नी और बच्चों को बल्कि पूरे परिवार और पड़ोसियों तक पहचाना उसने बताया कि गत जन्म मे ट्रक के पहिये के नीचे आकर सर कुचलने के कारण उसकी मृत्यृ हो गई थी छोटे लाल के परिजनो ने भी इस घटना की पुष्टि की मि. ग्रोवर ने पाराशरी पद्धति से कंुडली का बड़ा सुंदर और ज्ञानवर्घक विवेचन किया और बताया कि कुडली के नवम भाव नवमेश और गुरू से पूर्वजन्म का पता चलता है। नवम भाव का द्वितीय वाणी के भाव से संबध होने पर जातक को अपना पूर्वजन्म याद रहता है। और वो अपने पूर्वजन्म के बारे मे बताता है। जो आकाश की कंुडली पर शत प्रतिशत लागू होता है। मि. ग्रोवर ने नाड़ी ज्योतिष के विद्वान स्व. जगन्नाथ भसीन की पुस्तक द आर्ट आॅफ प्रैडिक्शन के पेज न. 170 पर वर्णित पूर्वजन्म के विशेष सूत्र का भी प्रमाण दिया हैं जो इस जंमाक पर लागू हो रहा है स्व भसीन के अनुसार नवम भाव से सप्तम तृतीय भाव गत जन्म की पत्नी व गत जन्म को बताता है। तृतीय भाव का वर्तमान जन्म की लग्न के सप्तम भाव पत्नी के भाव से संबध भी पूर्वजन्म के जीवन को बताता है। यह सूत्र भी जंमाक पर लागू हो रहा है यहां ना केवल तृतीयेश शुक्र और सप्तमेश बुध द्वादश भाव मे युत हैं बल्कि तृतीयेश बुध लग्नेश मेष के गुरू से सप्तमेश शुक्र से भी युत है। जमांक मे उपरोक्त दोनों योग लागू हो रहे है। तथा बुध शुक्र का राशीश शनि पुनः वाणी भाव द्वितीय के गत जंम के कारक ग्रह द्वितीयेश व नवमेश के मंगल व के साथ बैठा है। यह योग सूर्य चन्द्र कुंडली से भी प्रमाणित है। भृगु नंदी नाड़ी और गत जन्म का ज्ञान-
भृगु नाड़ी के अनुसार जंमस्थ गुरू से 12 वे भाव की राशि गत जन्म की लग्न होती है। उसे लग्न मान कर वर्तमान कुंडली का अध्ययन करने से गत जन्म का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। वर्तमान कुंडली मे जंमस्थ गुरू मेष राशि मे है। अतः जातक का नाम मेष राशि से केन्द्रीय राशि के अक्षरों से प्रांरभ होगा जातक का नाम आकाश है। जो जंमस्थ मेष के गुरू से केन्द्रीय राशि मे है। गत जन्म मे जातक का गुरू मीन राशि मे था अतः जातक का नाम मीन राशि से केन्द्रीय राशि के अक्षरों से शुरू होगा गत जन्म मे उसका नाम छोटेलाल था जो मीन राशि से केन्द्रीय राशि मिथुन मे आता है। मीन राशि गत जन्म की जाति बतायेगा मीन राशि मे बुध नीच का और शुक्र उच्च का होता है। दोनो ग्रह पिछड़ी जाति के बताते है। बुध ग्रह निम्न पिछड़ी जाति या दलित और शुक्र ग्रह उच्च पिछड़ी जाति को बताते है। अतः छोटेलाल निम्न पिछड़ी जाति या दलित जाति मे पैदा हुआ था गत जन्म मे जातक मीन लग्न मे पैदा हुआ था मीन लग्न का अष्ठमेश शुक्र ना केवल द्वादश भाव मे है बल्किपाप कर्तरी मे भी है। अतः निश्चित रूप से जातक गत जन्म मे अल्पायु, दुःमरण मृत्यु का शिकार हुआ था मृत्यु व पापकारक राहू अपनी परम शत्रु राशि कर्क मे है। कर्क राशि जन्म-जन्मातरों की राशि है अतः जातक उस जन्म मे कई जन्मों के पाप भुगत रहा था कई जन्मों के पाप लिये मृत्यु का कारक ग्रह राहू ने वक्र गति से दुर्घटना कारक मंगल पर सीधा हमला किया जिससे भीषण दुर्घटना हुयी वो अपने परम शत्रु नीच के शनि से भी युत था अतः मंगल अपने दो शत्रु ग्रहों से घिरा है। तीसरा मंगल ठीक राहू व केतु की केन्द्रीय राशि मे था जिससे वो राहू केतु के बंधन या चंगुल मे था राहू व मंगल के बीच कोई ग्रह नही था जो राहू को रोकता मंगल को अपने मित्र ग्रहों सूर्य चन्द्र गुरू से कोई मदद नही मिल रहा था अतः असहाय और अति निर्बल मंगल भीषण मृत्युकारी दुर्घटना का शिकार हुआ राशि चक्र की 12 राशियां शरीर के 12 अंगों केा बताती है। चुंुकि यह योग सिर की प्रतीक राशि मेष मे बना था अतः दुर्घटना मे सिर कुचला गया राहू ट्रक और पहिये का कारक ग्रह है। तथा मंगल व मेष राशि मशीन के कारक है। तो मशीन ट्रक व पहिया मौत का कारण बने द्वितीय भाव पत्नी के भाव सप्तम से आठवां है। जो पत्नी की आयु बताता है। जहां स्वग्रही मंगल व नीच का शनि बैठा है। अष्ठम भाव पर शनि की युति या दृष्टि दीर्घायु देती है अतः अष्ठमस्थ शनि व स्वग्रही अष्ठमेश के कारण पत्नी दीर्घायु हुयी यद्यपि शनि मीन लग्न के जातक के 8 वे भाव पर भी दृष्टि डाल रहा है। पर शनि ने दो कारणों ने उसे दीर्घायु नही बनाया पहला शनि सप्तमेश बुध का परम मित्र पर मीन लग्न के लग्नेश गुरू का शत्रु ग्रह है दूसरा द्वितीय भाव मे स्व्रगही व पापग्रस्त मंगल बैठा है। जो पत्नी के भाव सप्तम से 8 वें भाव मे बैठ कर पत्नी को बेहद खतरनाक प्रकार का मंगली दोष दे रहा हैं साथ ही मंगल नीच व अपने शत्रु ग्रह शनि से भी युत है। अतः मंगली दोष दुगना हो गया है। 8 वें भाव का मंगल भंयकर मंगली दोष बना रहा था। आकाश का जंम इस प्रकार का है। मीन लग्न-18.36 अंश लग्न मे सूर्य-4.54 मेष मे मंगल-3.12, शनि-20.15 गुरू-12.28, कर्क मे राहू-8.24, सिंह मे चन्द्र-20.27, मकर मे केतु-8.24, कुंभ मे बुध-9.46 शुक्र-13.02। पूर्वा फाल्गुनी तृतीय चरण, शेष शुक्र महादशा-9 वर्ष 3 माह 21 दिन।