भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं

आनलाइन रंग संवाद में शाश्वत, सांस्कृतिक सामाजिक एवं संस्कृत संस्था, समन्वय रंगमंडल, आधारशिला रंगमंडल, समानांतर, मंथन कला, विनोद रस्तोगी संस्थान भारतेंदु बाबू के जन्मदिवस पर उन्हें नमन करते वरिष्ठ रंगकर्मी अभिलाष नारायण जी ने कहा भारतेंदु बाबू की कालजई कृति अंधेरे नगरी को प्रयाग, काशी के संगम से नया कलेवर दिया गया जिसमे मूल योगदान प्रयाग के महान निर्देशक डा सत्यव्रत सिन्हा का रहा, और प्रस्तुति में जान फूँकी राजा की भूमिका निभाने वाले काशी के श्री नील कमल चैटेर्जी ने. आधारशिला रंगमंडल के अजय केसरी भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के जन्मदिवस पर मैं आधारशिला परिवार की तरफ से श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं और उनके सम्मान में बस मैं इतना ही कहूंगा वह आधुनिक हिंदी साहित्य, गद्य, पद्य एवं पत्रकारिता एवं आधुनिक हिंदी नाटकों के और उपनिवेशवाद के जनक कहे जाते हैं बाल्यकाल की अवस्था में मात्र 12 वर्ष की आयु में ही उन्होंने पंडित मंगला प्रसाद त्रिपाठी द्वारा रचित नाटक जानकी मंगल मे अभिनय भी किया मात्र 34 साल 4 महीने की अल्प आयु में दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन दुनिया छोड़ने से पहले वे अपने क्षेत्र में इतना कुछ कर गए कि हैरत होती है कि कोई इंसान इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ कैसे कर सकता है हमें मालूम हो या ना हो लेकिन यह सच है कि आज का हिंदी साहित्य जहां खड़ा है उसकी नीवं का ज्यादातर हिस्सा भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनकी मंडली ने खड़ा किया था उनके साथ पहली बार वाली उपलब्धि जितनी बार जुड़ी है उतनी बार बहुत ही कम लोगों के साथ जुड़ पाती है इसीलिए कई आलोचक उन्हें हिंदी साहित्य का महान अनुसंधानकर्ता भी मानते हैं इन्हीं शब्दों के साथ मैं उन्हें पुनः श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।
संबंध में रंग मंडल की सचिव सुषमा शर्मा भारतेंदु हरिश्चंद्र का लेखन सीधे लोक चेतना से जुड़ता है और अपने युग के सारी गतिविधियों को प्रतिबंधित करता है उनके विचार में भाषा और साहित्य समाज को शिक्षित और संस्कारित करने का सबसे बड़ा माध्यम है ऐसे भारतेंदु हरिश्चंद्र को उनके जन्मदिवस पर मैं समन्वय रंग मंडल की ओर से श्रद्धा सुमन अर्पित करती हूं.।
शाश्वत की महासचिव ऋतंधरा मिश्रा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850-6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम हरिश्चन्द्र था, भारतेन्दु उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया नाटक भारत दुर्दशा और अंधेर नगरी इसके अतिरिक्त अनेक काव्य कृतियां निबंध संग्रह अनुवाद किया है।